विद्वता के आगार और विनम्रता के सागर थे आचार्य शिवपूजन सहाय

 फ़क़ीरी की ज़िंदगी जीने वाले हिंदी के महान साहित्य सेवी आचार्य शिव पूजन सहाय का साहित्यिक व्यक्तित्व हिमालय की तरह ऊँचा था। उन्होंने काशी विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय की भाँति साहित्य और शिक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आचार्य जी जिस ऊँचाई के साहित्यकार थेवैसा सम्मान उन्हें नहीं दे पाए।

यह बातें आज यहाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन में आचार्य सहाय की जयंती पर आयोजित समारोह और कथासंगोष्ठी का उद्घाटन करते हुएपाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो गुलाब चंद्र राम जायसवाल ने कही। उन्होंने कहा कि,हिंदी के लिए पूरे हिंदुस्तान में एक अलख जगाया जाना चाहिए। साहित्य सम्मेलन एक ऐसा कार्यक्रम बनाए,जिससे पूरे देश में हिन्दी के लिए सगौरव जागृति आए। तभी हम हिंदी के लिए अपना मन प्राण देने वाले आचार्य सहाय जी जैसे मनीषियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इस अवसर पर अपना विचार व्यक्त करते हुएआचार्य जी के पुत्र प्रो मंगलमूर्ति ने कहा किशिवाजी १९५० से १९५९ तककुल ९ वर्षों तक साहित्य सम्मेलन के परिसर में हीं रहते थे। हमारा पूरा परिवार यहीं रहता था। वे दिन रातहिंदी भाषासाहित्य और साहित्यकारों के उन्नयन के लिए लगे रहते थे। अपनी संपूर्ण ऊर्जा और आत्मा को उन्होंने हिंदी के लिए लगा दी। यह साहित्य सम्मेलन का स्वर्णिमकाल था। देश भर के साहित्यकार अपनी पांडुलिपियाँ लेकर यहाँ आते थेआचार्य जी से दिखाने के लिए। उन्होंने आचार्य जी के साहित्यिक अवदानों की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि शिवजी हिंदीसाहित्य मेंअपने समय में भी महत्त्वपूर्ण थे और आज भी महत्त्वपूर्ण है। १९४० से १९६३ के बीच लिखी गई उनकी डायरी हिंदी साहित्य की एक महान धरोहर है। उन्होंने एकएक वर्ष में तीनतीन डायरियाँ लिख जाते थे। दो खंडों में उनकी डायरी और तीन खंडों में उनके पत्राचार का प्रकाशन शीघ्र होने जा रहा हैजो हिंदी की अमूल्य निधि सिद्ध होगी।

सभा की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा किभाषा और साहित्य के महान उन्नायक आचार्य शिवपूजन सहाय बिहार के साहित्यिक गौरव थे। वे विद्वता के आगार और विनम्रता के सागर थे।शिवजी हिंदी साहित्य के जीवित ज्ञानकोश व अद्भुत प्रतिभा के संपादक थे। उनके संपादन कौशल की कोई तुलना नही थी। कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद्र हों या किकामायनी‘ जैसे महाकाव्य के रचयिता महाकवि जयशंकर प्रसादसभी अपनी पुस्तकेंप्रकाशन के पूर्व आचार्य जी से दिखा लेना आवश्यक समझते थे। कहा जाता है कि उनके हाथों में संपादन की एक ऐसी क्षेणीहथौड़ी थीजिससे अनगढ़ साहित्य को भी तराश कर,आकर्षक और मूल्यवान बना दिया जाता था। डा सुलभ ने कहा किआचार्य शिव जी जितने बड़े विद्वान थे,उतने ही सरलसहज और विनम्र साधुपुरुष थे। सम्मेलन के सभी लेखनकार्य वे स्वयं करते थे। सम्मेलन से जुड़ने के पश्चात सम्मेलनभवन हीं उनका निवासस्थान था। वे सम्मेलन के पत्रों पर अपने हाथों से टिकट साटने से लेकर उन्हें डाकपेटी में डालने तक का कार्य करने में संकोच नहीं करते थे। भारत सरकार के पद्मभूषणसम्मान से विभूषित शिवजी ने अनेक साहित्यिक पत्रपत्रिकाओं के संपादन के साथसाथ कथासाहित्य को अनेकों ग्रंथ दिए। बिहार का साहित्यिक इतिहास और भारत के अनेक महापुरुषों की जीवनियां भी लिखी। देश रत्न डा राजेंद्र प्रसाद की आत्मकथा का संपादन भी किया। राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक के रूप में ५० से अधिक शोधग्रंथों का संपादन और प्रकाशन किया। हिंदी साहित्य में उनका अवदान अतुल्य है।

आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुएसम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त ने कहा किशिवजी दधीचि की तरह हिन्दी के लिए अपनी सारी हड्डियाँ गला दी। सम्मेलन की शोधपत्रिकासाहित्य‘ उनके कार्यकाल में राष्ट्रीयस्तर पर शिखर पर प्रतिष्ठित थी। उसमें छपने के लिए देश भर के साहित्यकार लालायित रहते थे।

इस अवसर पर आयोजित ल

घुकथागोष्ठी में सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने एक चूहे की हत्या‘ शीर्षक से अपनी कथा का पाठ किया,जिसमें यह बताने की चेष्टा की गई है किमनुष्यों के भीतर स्थित आसुरी शक्ति को समाप्त करना बहुत ज़रूरी हैअन्यथा वह बड़ा भारी अनर्थ कर सकती है। डा कल्याणी कुसुम सिंह ने मोबाइल मार गया‘, अमियनाथ चटर्जी ने जय हो!’,डा मेहता नगेंद्र सिंह ने वनमहोत्सव‘,श्री घनश्याम नेव्यसन‘, राज कुमार प्रेमी ने सच्चा प्यार‘, डा शालिनी पांडेय ने मशीन‘,डा सुलक्ष्मी नेतन्हा‘, शुभचंद्र सिन्हा ने माँ‘,डा आर प्रवेश ने लोभतथा प्रभात कुमार धवन ने प्रतिशोधशीर्षक से अपनी अपनी लघुकथाओं के पाठ किए। इस अवसर पर सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा,डा कल्याणी कुसुम सिंहप्रो इंद्रकांत झाडा विनय कुमार विष्णुपुरीबंधु कुशावतजय प्रकाश पुजारीआचार्य आनंद किशोर शास्त्रीचंदा मिश्रडा नागेश्वर प्रसाद यादवअर्जुन प्रसाद सिंहधनराज सिंहतथा पवन कुमार मिश्र समेत बड़ी संख्या प्रबुद्धजन उपस्थित थे।मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवादज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

Author: Ravi Kumar Sinha

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