Category: आलेख

आरक्षण पर श्वेत पत्र की आवश्यकता- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

डा॰ जगन्नाथ मिश्र ने कहा कि सरकारी सेवाओं में आरक्षण को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है, जिसे आने वाले दिनों में और बढ़ाने की कोशिश हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार के स्तर पर स्थिति को स्पष्ट कर दिया जाए कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को न सिर्फ कायम रखा जाएगा, बल्कि इसे और मजबूत किया जाएगा। राजग सामाजिक न्याय के चैंपियन के तौर पर सामने है। राजग बाकी दलों को दिखा दे कि वास्तविक सामाजिक न्याय कैसा होना चाहिये। आरक्षण की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक श्वेत पत्र केन्द्र सरकार लाये। उस श्वते पत्र में आरक्षण से जुड़े तमाम पहलुओं पर छानबीन करके रिपोर्ट रखी जाय। उस श्वेत पत्र पर राष्ट्रीय बहस हो औरउसके हिसाब से नीतियाँ बनें। आरक्षण रहने के बावजूद केन्द्र और राज्य सरकारों की सेवाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं हो पाया है? इस बारे में मिली जानकारी और तमाम अन्य स्रोत बताते हैं कि आरक्षण की वजह से जितने पद भरे जाने थे, उनमें से आधे या उससे भी कम पद अबतक भरे गये हैं। जाहिर है कि आरक्षण लागू करने में कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी हो रही है। जिन पदों को आरक्षण के द्वारा भरा जाना है, उन पदों को किसी और तरीके से कैसे भरा जा रहा है? इस बारे में जाँच हो। इस बारे में विचार करना चाहिये कि क्या आरक्षण को लेकर कानून बनाया जाना चाहिये और आरक्षण संबंधी प्रावधान के उल्लंघन को दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध घोषित करके इसके लिए आर्थिक दंड और कैद की सजा का प्रावधान होना चाहिये। संवैधानिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। केन्द्र सरकार के सचिव स्तर के पदों में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई अफसर नहीं है। यह लम्बे समय से चला आ रहा है। इसे देखते हुए यह आवश्यक है कि श्वेत पत्र इस बारे में विचार करे कि पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किस तरह सख्ती से अमल में आये, ताकि प्रशासन के शिखर पर भी सामाजिक विविधता नजर आये। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ ही अन्य पिछड़े वर्ग के लिए भी लागू हो, क्योंकि उच्च पदों पर इन तीनों समूहों की उपस्थिति न के बराबर है। श्वेत पत्र में इस बारे में सुझाव शामिल होने चाहिए। दलितों और पिछड़ी जाति के बच्चों के ड्राप आउट रेट का अध्ययन करें तो पता चलता है कि जैसे-जैसे इन समुदायों के बच्चों की कक्षा आगे बढ़ती जाती है उनकी शिक्षा क्रमशः कम होने लगती है। बिहार में ड्राप आउट रेट कक्षा 1 से 5 के बीच 77 प्रतिशत है जबकि देश का औसत 25 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति के छात्रों में यह दर 61 प्रतिशत है। बिहार में कक्षा 1 से 8 तक यह दर 76 प्रतिशत है। कक्षा 1 से 10 के बीच यह दर 85 प्रतिशत पहुँच जाती है। 1ली से 8वाँ तक पहुँचने के बीच बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। प्राइमरी में तो उनका कोटा पूरा हो जाता है, लेकिन आगे का कोटा भरता नहीं है। आरक्षण के बावजूद एक अध्ययन से पता चला कि राज्य के तमाम विभागों और श्रेणियों में 3,94,173 पदों में दलितों का प्रतिनिधित्व 6.19 प्रतिशत है। यानी आरक्षित पदों में आधे से कम पदों पर ही दलितों की बहाली हुई। हाउस होल्ड सर्वे में पता चला कि 23 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं।
डा॰ मिश्र ने कहा कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की उपस्थिति कैसे सुनिश्चित हो। खासकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और केन्द्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में कुलपति, निदेशक, संकाय प्रमुख, प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर सामाजिक विविधता का घोर अभाव है। सरकार इस बारे में आरटीआई में बार-बार जानकारी देती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि स्थिति को सुधारा कैसे जाए। इस बारे में ठोस सुझाव देने चाहिये, ताकि ज्ञान के सृजन के केन्द्रों में सामाजिक विविधता आये और शैक्षिक परिसरों का वातावरण समावेशी बने। इस बात का अध्ययन शामिल होना चाहिये कि आरक्षण के प्रावधानों के अंदर ऐसी कौन-सी व्यवस्थाएं की जाएं, ताकि इनका लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं को भी मिले। इन समूहों की महिलाएं एक साथ, जाति और लिंग-भेद, दोनों का दंश झेल रही हैं। इनको दोहरे सहारे और संरक्षण की जरूरत है। इन वर्गों की महिलाएं देश की आबादी का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा हैं, इसलिए इनकी तरक्की के बिना देश के विकास की कोई भी कल्पना साकार नहीं हो सकती। इन वर्गों की महिलाओं को महिला विकास के तमाम कार्यक्रमों में हिस्सेदार बनाने के लिए श्वेत पत्र उपाय सुझाये।
डा॰ मिश्र ने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि उसका इरादा आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत करना है। यह बात जनता तक स्पष्ट पहुँचनी चाहिये कि समीक्षा करने का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है। इस बारे में सरकार और सरकार में शामिल दलों और अनुषंगी संगठनों को अनावश्यक बयानबाजी से सख्त परहेज करना चाहिये। बिहार चुनाव के नतीजों से जाहिर है कि यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से कितना संवेदनशील बन गया था और इसके कितने गहरे नतीजे हुए हैं। यह समझना आवश्यक है कि आरक्षण और विशेष अवसर का सिद्धांत हमारे संविधान और लोकतंत्र के मूल में है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने इसका प्रावधान मूल अधिकारों के अध्याय में ही किया है और स्पष्ट किया है कि इससे समानता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। भारत जैसा विविधतापूर्ण देश, राजकाज की संस्थाओं और अवसरों में सामाजिक विविधता सुनिश्चित किये बगैर एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकता। सामाजिक विविधता इस देश की ताकत है। इसका प्रतिविम्ब तमाम संस्थाओं में नजर आये इसके लिए आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत किया जाय। सरकार और राजनीतिक पार्टियों को महज वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर समाज के वंचित वर्ग के लिए ठोस कार्यनीति अपनाने की जरूरत है। देश में 94 फीसद बच्चे 12वीं के बाद शिक्षा जारी नहीं रख पाते और इनमें अधिकतर कोटा वर्ग के होते हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को अभिशप्त करीब 40 करोड़ आबादी में तकरीबन 32 करोड़ कोटा वर्ग के लोग हैं। इनकी गरीबी दूर हो इस पर गंभीर विमर्श और पहल की जरूरत है। आरक्षण के हिमायती अक्सर इन मुद्दों से कतराते नजर आते हैं।

आजादी के 70 वर्ष बाद भी दलित-आदिवासी और हाशिये पर

डा॰ जगन्नाथ मिश्र
रिपोर्ट के अनुसार आजादी के 70 वर्ष बाद भी दलित-आदिवासी और हाशिये पर रहे तबकों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई है और न ही वे सच्चे अर्थों में आजाद हुए हैं। आज भी देश के हर कोने से आये दिन दलित उत्पीड़न की घटना देखने को मिलती है। प्रायः दलितों को संरक्षण देने के नाम पर अनेक कानून और संस्थाओं का निर्माण किया लेकिन, उचित एजेंडे और समन्वय की भावना के अभाव में इन्हें दिशा दे नहीं पाये हैं। देश की किसी भी राज्य की सरकार ने इसकी सुध नहीं ली हैं। रिपोर्ट आने के पश्चात सत्ता पक्ष और विपक्ष इस पर बहस करेंगे, जो अच्छी बात है। किन्तु कोई सार्थक दिशा ली जाएगी, इसकी संभावना कम ही है। अनुसूचित जाति और जनजाति के वर्गों के लोगों में जागरूकता लाने तथा निःशुल्क विधिक सहायता देने जैसे कार्यों से दलित उत्पीड़न रोका जा सकता है। फिर स्थायी बदलाव के लिए समाज की मानसिकता में बदलाव लाना भी जरूरी है। सामाजिक सोच बदलने के लिए सम्बधित सूचना और ज्ञान सम्पन्न होना जरूरी है। तभी नये विचारों के लिए मानसिकता तैयार हो सकेगी। अशिक्षित समाज में ही रूढ़ियों और कुरीतियों का जन्म होता है। आज भी जहाँ दलित बहुसंख्यक इलाके हैं, वहाँ शिक्षा की कमी है। वहाँ साक्षरता बढ़ाने के विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे, जिससे दलित वर्ग में जागरूकता आएगी। 1989 के अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में एक विशेष बदलाव कर इसमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक आमजन की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत हैं, न कि इस पर बेनतीजा राजनीतिक बहस की। दरअसल, समाज के स्तर पर ही उत्पीड़न के खिलाफ जबर्दस्त वातावरण निर्मित करने की जरूरत है।
डा॰ मिश्र ने अपने पत्र में कहा कि रिपोर्ट के अनुसार क्या गरीब एवं पीड़ित परिवार के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा इसलिए नहीं मिलेगी कि उसका जन्म एक गरीब दलित परिवार में हुआ? क्या एक लोकतांत्रिक और लोक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी अपने तमाम बच्चों को गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं है? क्या राज्य अपने इस दायित्व से भाग सकता है? अगर हम भारतीय राज्य का आकलन समान, सार्वजनिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के आधार पर करें तो भारत ने अपने ही बच्चों के साथ पर्याप्त भेदभाव किया है। आज पूरे देश में बहुस्तरीय शिक्षा व्यवस्था कायम है। बच्चे के परिवार की जो सामाजिक-आर्थिक हैसियत होती है, उसे शिक्षा भी उसी स्तर की मिल रही है। फिर शिक्षा की भाषा और गुणवत्ता, स्कूल की प्रकृति सब मिलकर बच्चे का भविष्य तय कर देते हैं, जिसमें बच्चों को मिलने वाले रोजगार की प्रकृति और चरित्र भी शामिल है। एक तरफ, अमीर बच्चों के लिए सारी सुविधाओं से लैस अंगरेजी माध्यम वाले निजी विद्यालय हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चे की पूरी पढ़ाई रोजगार की वैश्विक प्रकृति के अनुकूल होती है। वहीं गरीब दलित बच्चों को साधनविहीन सरकारी विद्यालयों के हवाले कर दिया गया है, जहाँ बहुत सारे अप्रशिक्षित और कम वेतन वाले पैरा शिक्षक हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में जैसे-तैसे शिक्षण कर्म का निर्वाह करते हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे साधनहीनता और शैक्षणिक वातावरण के अभाव में स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। जो बचते हैं उनमें दसवीं कक्षा के बाद पढ़ाई की इच्छाशक्ति नहीं रह जाती है।

‘‘जातिवाद और सांप्रदायिकतावाद’’लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरे का संकेत

पटना, 16 अगस्त, 2016

कल 71वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के तत्वावधान में बिहार आर्थिक अध्ययन संस्थान के सभागार में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के उपरान्त ‘‘जातिवाद और सांप्रदायिकतावाद’’लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरे का संकेत विषय पर आयोजित परिसंवाद को सम्बोधित करते हुए प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डा॰ जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूलभूत अवधारणा है। जहाँ भारत के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी है। किन्तु राज्य (शासन) की दृष्टि में किसी व्यक्ति के धर्म या विश्वास की कोई महŸाा नहीं है क्योंकि राज्य (शासन) की दृष्टि में सभी लोग समान हैं और समान ढंग के व्यवहार के हकदार हैं। कोई भी राजनीतिक दल धार्मिक दल नहीं बन सकता। राजनीति और धर्म को एक साथ नहीं मिलाया जा सकता। कोई भी राज्य, सरकार यदि धर्मनिरपेक्षता से भिन्न नीति अपनाती है या धर्मनिरपेक्षता से भिन्न कार्य करती है, तो वह संवैधानिक मान्यता के विपरीत है, और वह अपने को अनुच्छेद 356 के अधीन कार्रवाई के लिए पात्र बनाती है।’’ उच्चतम न्यायालय के निर्णय का आधार संभवतः महात्मा गांधी की वह उक्ति है जिसके अनुसार ‘धर्मनिरपेक्षता’ सभी धर्मों का समान आदर करना है, समान अनादर करना नहीं। उनकी अपनी परिभाषा यह है कि यह व्यक्तियों और व्यक्तियों व संस्थाओं के बीच के कारोबार की एक प्रणाली है, जिसमें कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष की धार्मिक आस्थाओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं रहता और जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके धर्म या जाति पर विचार किये बिना समान अवसर उपलब्ध है। संप्रभु राज्य का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे, क्योंकि हरेक नागरिक अपना विषेषाधिकार संप्रभु के हवाले करता है। धर्मनिरपेक्षता प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है और उसे अपने दिमाग की षांति, नैतिक बल, आषा तथा उम्मीद किसी भी स्रोत से हासिल करने की आजादी है। इस मामले में हम महात्मा गांधी द्वारा कही गयी बात याद करें। ‘ईष्वर अल्लाह तेरे नाम’, प्रत्येक धर्म हमें सिखाता है कि ईष्वर हम में से प्रत्येक में है और वह इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता। इसलिए यह कहना कि मेरा ईष्वर सबसे महान है, अपने ईष्वर का ही सम्मान कम करना है।
श्री रामउपदेश सिंह, भा॰प्र॰से॰ (अ॰प्रा॰) ने कहा कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय आधार पर सामाजिक सद्भाव एवं समरसता को खंडित कर राजनीति नहीं चलायी जा सकती। यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि राजनीति की बुनियाद सामाजिक समरसता, धर्मनिरपेक्षता और सभी समूहों और जातियों की साझेदारी पर निर्भर है। इसी मान्यता के आधार पर विषमतारहित समाज-व्यवस्था के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में स्पष्ट रुप से कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं बरतेगी। सरकार को इस निर्णय से प्रचलित विषमताओं के निराकरण हेतु विभिन्न उपायों से सक्षम बनाया जा सकता है। इसमें सबसे अधिक लोकप्रिय तरीका ‘‘सकारात्मक पक्षपात’’ है। सकारात्मक पक्षपात का अर्थ होता है सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक रुप से कमजोर और वंचित वर्गों को षिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में विषेषाधिकार देना।
श्री बच्चा ठाकुर भा॰प्र॰से॰ (अ॰प्रा॰), ने कहा कि आज हम अतीत के सांप्रदायिकता की काली छाया से पिछले तीन वर्षो में बहुत हद तक उबरने लगे हैं, अब राष्ट्र की फिजां एकता की डोर में बंधने लगी है। हम अपने पुराने गौरव की ओर लौट रहे हैं। भाजपा (भविष्य) समाज के साथ और भाईचारे की भारत लिखेगा। पिछले तीन वर्षों में अल्पसंख्यकों के लिए एक माहौल बना है, अगर यही रफ्तार रही तो भारत के मुसलमान पूरी तरह से हीन भावना से निकल आएँगे।
श्री श्याम बिहारी मिश्र ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता लगाातार जाहिर करते रहे हैं। जहाँतक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिमों में असुरक्षा की बात है। इसके प्रतिकूल परिणामों से सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुँच रहा है। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सबों पर है। श्री रघुवीर मोची ने कहा है कि आज की आवष्यकता यह है कि जो भी आर्थिक रूप से पीछे हैं उनके उत्थान के लिए विषेष उपाय किए जाएं। वे चाहे किसी भी जाति, वर्ग, समुदाय या क्षेत्र के हों। आर्थिक आधार पर आरक्षण सभी निर्धनों-पिछड़ों के लिए हितकारी तो होगा ही, वह समाज में किसी प्रकार का द्वेष भी पैदा नहीं करेगा। आजादी के तुरंत बाद तो जातिगत आधार पर आरक्षण का औचित्य बनता था, क्योंकि तब अनेक समुदायों के पिछड़ेपन का मुख्य कारण उनकी जाति थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
इस परिसंवाद में भाग लेने वालों में प्रमुख थे:- डाॅ॰ ज्योतिन्द्र चैधरी, रामउदार झा, शेखर राम, भरत त्रिपाठी, जयनारायण प्रसाद, अनवार खाँ, कृष्ण कुमार ठाकुर, रामप्रवेश यादव, आदि जिन्होंने अपने विचार प्रकट किये।

देश की आजादी अगस्त क्रान्ति द्वारा बनायी गयी पृष्ठभूमि के कारण प्राप्त हुई- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

पटना, 9 अगस्त, 2017
75वें अगस्त क्रान्ति दिवस के अवसर पर प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डा॰ जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री (बिहार) एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि भारत को आजादी एक लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हुई। भारत के सफल स्वातंत्र्य संग्राम के इतिहास में अगस्त क्रांति (भारत छोड़ो आंदोलन) अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणा प्रद रहा है। चाहे धार्मिक राजनीति हो अथवा विशुद्ध संवैधानिक उग्र क्रांतिकारी विस्फोट हो या फिर गाँघी जी के अनुप्रेरक नेतृत्व में सत्याग्रह, इस सभी में गांधी जी की महत्वपूर्ण देन रही है। सरकारी प्रलेखों, पत्रों, अप्रकाशित अभिलेखों तथा निजी पत्राचारों सहित सभी उपलब्ध सूत्रों पर आधारित होने के फलस्वरूप यह सर्वथा प्रामाणिक भी है, किन्तु उन्होंने जो किया उसका सर्वाधिक महत्व है। यह आंदोलन हमारे स्वतंत्रता संग्राम का, जिसका गाँधी जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रमुख उपकरण बन गया। विभिन्न चरणों में देश की जनता ने उपयुक्त हिस्सा लिया। गाँधी जी कहा था कि वे ऐसे भारत के निर्माण के लिए कोशिश करते रहंेंगे, जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी यह महसूस करे कि यह उसका देश है जिसके निर्माण में उसके आवाज का महत्त्व है। वे ऐसे भारत के लिए कोशिश करते रहे, जिसमें ऊँंच-नीच का कोई भेद न हो। सभी जातियाँ मिल-जुलकर रहे। उनके भारत में, अस्पृष्यता व शराब तथा नशीली चीजों के अनिष्टों के लिए कोई स्थान न हो। उसमें स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार मिलेे। सारी दुनिया ंसे भारत का संबंध शांति और भाईचारे का रहे। यह है उनके सपनों का भारत। गाँधी जी के अनुसार आर्थिक न्याय के अभाव में सामाजिक न्याय कल्पना मात्र है। उनके अनुसार आर्थिक न्याय का अभिप्राय है कि धन-सम्पदा के आधार पर व्यक्ति-व्यक्ति के बीच विच्छेद की कोई दीवार खड़ी नहीं की जाए। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का अथवा एक वर्ग को दूसरे वर्ग का शोषण करने का अधिकार नहीं है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, दाण्डी मार्च, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आन्दोलन तथा सम्पूर्ण स्वाधीनता के लिए ‘करो या मरो’ आदि अभियान समय-समय पर चलाये गये। असंख्य ज्ञात एवं अज्ञात वीर क्रान्तिकारियों तथा महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने तन-मन-धन से स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय योगदान किया और अपने प्राणों तक की आहुति देने में भी गर्व का अनुभव किया। यह हमारे देश के वीर क्रान्तिकारियों के ही संघर्ष का प्रतिफल है कि हमें आजादी मिली।
डा॰ मिश्र ने कहा कि सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन का अपना अलग ही गौरवशाली महत्व है। इस आन्दोलन से यह स्पष्ट हो गयी थी कि लोगों में आजादी को लेकर असंतोष नई ऊँचाई तक पहुँच गयी थी लोगों को असंतोष को समझते हुए और गतिरोध तोड़ने के लिए गाँधी जी तत्काल स्वराज चाहते थे। उन्होने दावा किया किया था कि ब्रिटिश शासन अपनी वैद्यता खो चुकी है। गौरतलब है कि गाँधी जी ने भारत की आजादी के संघर्ष में आजादी को अहिंसा से परिभाषित किया। अहिंसा उनके आंदोलन का सर्वोत्तम हथियार रही। अंग्रेजों को इतने विद्रोह की उम्मीद नहीं थी। शूरू में उनका प्रयास इसके प्रभावों को कम करने की थी। उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि 1857 के बाद भारत छोड़ो आंदोलन अब तक का सबसे बड़ा विद्रोह था। उसमें यह प्रदर्शित हुआ कि भारतीयों को साहस, शौर्य, प्रशिक्षित लड़ाकों और आपसी समन्वय के साथ काम करने की क्षमता है। अगस्त क्रांति भारत को आजाद तो नहीं करा सका लेकिन यह स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हुआ। लोग आजादी पाने के लिए बेचैन थे। भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजों को एहसास करा दिया कि भारत पर अब लंबे समय तक राज नहीं किया जा सकता इस आंदालन ने ही पूरे राष्ट्र को दिशा दी।

जीएसटी आजादी के 70 सालों में सबसे बड़े टैक्स सुधार – डा॰ जगन्नाथ मिश्र

पटना, 03 जुलाई, 2017
पं॰ जवाहर लाल नेहरू की तरह ही मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक उसी समय और स्थान को एक देश एक कर के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किया और 1 जूलाई से पूरा देश एक समान कर के धागे से गूंथ गया। प्रधानमंत्री श्री मोदी की मंशा थी कि तमाम गणमान्यों की गरिमामय उपस्थिति में जीएसटी की घोषणा के जरिये देश और दुनिया को यह संदेश दिया जाय कि भारत करों के जंजाल से आजाद हो गया है। इसका यह मतलब होगा कि भारत आर्थिक सुधारों के लिये प्रतिबद्ध है। सतत् और ऊँचे विकास के 70 साल पहले तय किये गये अपने लक्ष्य के प्रति वचनबद्ध है, जिसकी पं॰ नेहरू की जुबान में भारत ने बार-बार दोहराया था, जीएसटी उसी दिशा में एक महती कोशिश है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले साल 8 नवम्बर को नोट बंदी के बाद जीएसटी श्री मोदी सरकार का दूसरा बड़ा साहसिक फैसला है, जो लम्बे समय में आम आदमी और कारोबारियों को राहत देगा। आम आदमी तमाम उत्पादों पर अब तक 30 से 35 प्रतिशत तक टैक्स भरता है, जो अब घटकर 17 से 18 प्रतिशत तक रह जाएगा। चूंगी, आॅक्टराॅय टैक्स, बिक्री कर, उत्पाद शुल्क जैसे तमाम करों का जंजाल खत्म होने से इंस्पेक्टर राज और लाइसेंस राज की समस्या दूर होगी। जीएसटी से सैकड़ों कर कानूनों, जटिल प्रक्रियाओं और इंस्पेक्टर राज का अंत होगा, कारोबार में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। इससे पंजीकरण, रिटर्न, रिफण्ड और टैक्स भुगतान जैसी सभी प्रक्रियाओं का रिकाॅर्ड आॅनलाइन रहेगा। दुनिया के बहुत सारे देशों में जीएसटी लागू है। भारत में भी इसके लागू होने से उद्योग जगत और उपभोक्ता को फायदा पहुचेगा। जीडीपी और विकास दर बढ़ने से सरकार की कमाई बढ़ेगी और रोजगार भी बढ़ेंगे। अभिषेक जैन ने कहा कि जीएसटी का मेक-इन-इण्डिया पर भी सकारात्मक असर दिखेगा। वहीं पहले की तरह निर्यात में कोई शुल्क नहीं लगेगा और माल तैयार करने के दौरान दिये गये टैक्स की वापसी भी हो सकेगी। जीएसटी लागू होने के बाद भी महंगाई काबू में ही रहेगी। दरअसल, सिर्फ 19 फीसदी वस्तुओं पर ही टैक्स बढ़ेगा। अनाजों, रोजमर्रा की वस्तुओं और जरूरी सेवाओं को कर मुक्त या बेहद कम दरों के कोटे में रखा गया है। ज्यादातर सेवाएं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से बाहर हैं। ऐसे में जीएसटी का असर खुदरा मूल्यों पर दिखने की संभावना कम है। जीएसटी से कारोबार बढ़ने के साथ सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा। अभी देश की जीडीपी में करों का हिस्सा महज 16 प्रतिशत है, जो दूसरे देशों के मुकाबले काफी कम है। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि यह देश की संप्रभूत्व राष्ट्र वाली छवि मजबूत करेगा हमारे विविध और व्यापक राष्ट्रको जोड़ने का काम करेगा। यह एक ऐतिहासिक बदलाव है। केन्द्र और राज्य सरकारों को कर वसूली में वृद्धि होगी। इससे आर्थिक एकीकरण को मजबूती मिलेगी जिससे भौतिक और सामाजिक इंफास्ट्रक्चर बनाने में अधिक धन खर्च किया जा सकेगा, जैसे सिंचाई और जल संरक्षण योजनाएँ।
डा॰ मिश्र ने कहा कि वास्तव में आजादी के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार है। इसके लागू करने के आरंभ में समस्याएं आएंगी। कुछ परेशानियाँ भी होंगी। किंतु अंतिम रूप में यह सबके हित में है। इसलिए इसका विरोध करने की जगह इसमें सहयोग करना चाहिए।

‘‘योग की महत्ता मानव स्वास्थ्य’’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन

पटना, 20 जून, 2017
21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के तत्वावधान में बिहार आर्थिक अध्ययन संस्थान, पटना के सभागार में ‘‘योग की महत्ता मानव स्वास्थ्य’’ विषय पर आयोजित गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डा॰ जगन्नाथ मिश्र ने कहा कि योग की लोकप्रियता ने दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित किया है, जो योग द्वारा जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं। यह अत्यंत सफल भारतीय पद्धति में लोगों की आस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि दुनिया भर में योग का अभ्यास करने तथा उसे सीखने के इच्छुक लोगों को प्रशिक्षित करना, रास्ता दिखाने एवं परामर्श देने के लिए इसके आधार एवं ज्ञान का यथोचित उपयोग किया जाय। इसके लिए उन्हें योग का प्रशिक्षण देने हेतु विश्वसनीय एवं सक्षम व्यक्तियों का समूह तैयार करने के लिए तंत्र बनाना होगा ताकि वे इस प्राचीन भारतीय विज्ञान का संपूर्ण लाभ उठा सकें। यह तंत्र तैयार करने के लिए विभिन्न उपायों की आवश्यकता है, जिनमें से एक है योग से पेशेवरों की क्षमता का आकलन कर उन्हें प्रमाणित करना। इसमें उनसे पूछा जायेगा कि योग क्यों किया जाय और कैसे किया जाय? योग्यता के मूल्यांकन की पक्रिया को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य पक्रिया के माध्यम से तैयार किया गया। ज्ञान, कौशल एवं परिपक्वता के आधार पर योग पेशेवर को प्रशिक्षक, शिक्षक, विशारद अथवा आचार्य की श्रेणी में बांटा जा सकता है। मूल्यांकन की प्रणाली को इस तरह से तैयार किया जाता है कि योग पेशेवर का स्तर प्रशिक्षक से बढ़कर जैसे-जैसे आचार्य तक पहुँचता है, प्रदर्शन के स्थान पर अनुभव को अधिक वरीयता दी जाती है। विश्व भर में योग की बढ़ती लोकप्रियता को तब और प्रोत्सााहन प्राप्त हुआ, जब संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। हमारे माननीय प्रधानमंत्री के अथक प्रयासों के कारण योग को हमारी प्राचीन विरासत एवं धरोहर के रूप में पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इस तरह से भारत ने योग में विश्व नेता के रूप में अपने को स्थापित किया इसके साथ ही योग को उसके वास्तविक एवं विशुद्ध स्वरूप में संजोने एवं बढ़ावा देने का बड़ा दायित्व भी आ गया है। यह सब करने के लिए और 2015 में अंतरर्राष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा होने के कारण आयुष मंत्रालय ने योग पेशेवरों के मूल्यांकन एवं प्रमाणन हेतु योजना तथा योग संस्थानों के प्रमाणन की योजना तैयार करने हेतु भारतीय गुणवत्ता परिषद् (क्यूसीआई) को यह देखते हुए चुना कि क्यूसीआई के पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सर्वश्रेष्ठ प्रचलनों पर आधारित गुणवत्तापूर्ण प्रारूप तैयार करने में महारत है। भारतीय ग्रंथों में योग को प्राचीन विज्ञान कहा गया है। जिसे ऋषियों ने विकसित किया था और शताब्दी से जिसका अभ्यास किया जा रहा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों का संदर्भ देकर कई वर्षों से योग पर साहित्य तैयार किया गया है। यह पूरे विश्व में फैला हुआ है और इसकी लोकप्रियता तथा मानव मस्तिष्क एवं शरीर पर इसके प्रभाव को पूरे विश्व में स्वीकार किया जाता है। किन्तु अधिकतर लोगों को नहीं पता कि योग का विकास जीवन को परिवर्तित करने वाले अनुभव के रूप में हुआ है, जिसमें मानव सभ्यता को बेहतर बनाने की संभावना है। अध्यात्म और योग सत्य एवं वैज्ञानिक है, इसका प्रयोग करोड़ों मनुष्य कर रहे हैं। अब तो पश्चिम के वैज्ञानिक भी इसे मानने के लिए बाध्य हो गये हैं। अध्यात्म और योग अर्थात् जोड़ या मिलन, मिलन आत्मा का परमात्मा से, मिलन सत्य से, मिलन प्रकृति से, मिलन स्वयं से।
आयोजित गोष्ठी को सम्बोधित करने वालों में प्रमुख थेः- सर्वश्री श्याम बिहारी मिश्र, रामउदार झा, प्रो॰ रामानन्द पाण्डेय, बच्चा ठाकुर, भा॰प्र॰से॰ (अ॰प्रा॰), कृष्ण कुमार ठाकुर, भरत त्रिपाठी, मुरारी पाण्डेय, रघुवीर मोची, कामेश्वर पासवान, रामप्रवेश यादव, अनिल पाण्डेय, ई॰ राकेश, मनोज कुमार, कुमरजी झा, आदि ने भी अपने-अपने विचार प्रस्तुत किया।

पं॰ जवाहरलाल नेहरू द्वारा बताये गये आधुनिकतम वैज्ञानिकरण से ही आगे बढ़ा जा सकता है- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

पटना 26 मई, 2017
पं॰ नेहरू जी की दूर दृष्टि के कारण विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भारत में शक्तिशाली स्वदेशीय आधार निर्मित किया गया। इसका सुन्दर इस्तेमाल श्री मोदी को करना है जिससे हमारा उत्पादन सभी क्षेत्रों में बढ़े तथा हमारी अर्थव्यवस्था और भी सामथ्र्यवान बन सके। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये देश महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनेक प्रौद्योगिकी मिशनों की स्थापना की गई। पं॰ नेहरू जी ने इस देश में वैज्ञानिक प्रकृति को विकसित करने की मनोदशा तैयार की। उसे श्री मोदी सरजमीन पर उतारना चाहते हैं। एक नये स्वतंत्र और अत्यन्त ही निर्धन देश के लिये इस दिशा में बढ़ाना आसान काम नहीं है, परन्तु पं॰ नेहरू जी की उसी दृष्टि कि तरह श्री मोदी की सोच है कि यह एकमात्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी है जिससे भारत अपने को ऊपर उठा सकता है तथा आज देश वर्तमान अवस्था में इसलिये है क्योंकि पं॰ नेहरू जी ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक बल दिया। विकास का अर्थ समाज के विकास से होना चाहिये, विकास में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका मुख्य होती है। पं॰ नेहरू जी की तरह श्री मोदी वैज्ञानिक प्रकृति को विकसित करने की बात किया करते हैं। पं॰ नेहरू जी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बात उस समय करते थे जब कोई विश्वास नहीं करता था कि भारत इस दिशा में बहुत अधिक बढ़ सकता है। उस समय भयंकर संदेह का वातावरण था। पं॰ नेहरू जी ने समाज के लिये जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रकृति की बात की थी वह कुछ लोगों के लिये नहीं होकर सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिये थी। उसी तरह श्री मोदी विज्ञान का लाभ लाखों-लाख लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं। श्री मोदी की सोच के अनुसार आज राष्ट्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी बड़ी तीव्रता से आगे की ओर बढ़ रहा है। आज श्री नरेन्द्र मोदी जो कदम उठा रहे हैं जिससे विज्ञान और तकनीक गाँवों तक हमारे श्रमिकों तक तथा देश के हर तबके तक ले जाने का कार्य कर रहे हैं तथा उसमें जो लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं उन्हीं लोगों ने पं॰ नेहरू की भी आलोचना की थी जब वे विज्ञान और तकनीक की ओर अपना कदम बढ़ा रहे थे। जब पं॰ नेहरू ने भारी उद्योगों की चर्चा की तब एक विशाल समूह ने इसे नकारा तथा कहा कि भारत को ऐसा नहीं करना चाहिए। हर कदम पर उनका विरोध किया गया। देश में कोलाहल करने वाले गुट द्वारा विरोध किया गया परन्तु वे डटे रहे और श्री मोदी भी उस मार्ग पर डटे रहेंगे जिसे पं॰ नेहरू ने दिखलाया है। श्री मोदी पं॰ नेहरू के ही समान लधु उद्योगों का भी विकास चाहते हैं। श्री मोदी के लधु उद्योगों की अवधारणा पर भी पं॰ नेहरू की छाप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। श्री मोदी विज्ञान और प्रौद्योगिकी को हर घर में चाहे वह निर्धन से निर्धन व्यक्ति का क्यों नहीं हो, ले जाने का काम कर रहे हैं। वे किस प्रकार इस तथ्य की उपलब्धि सुनिश्चित की जाये और किस प्रकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग निर्धनों के लिए अधिकतम लाभ प्रदान करने के लिए किया जा सके। श्री मोदी हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के द्वारा निर्धनता पर विजय प्राप्त करने का मार्ग दिखलाया है। वे दृढ़ निश्चय के साथ कार्य कर रहे हैं।
डा॰ मिश्र ने कहा कि श्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित पंथनिरपेक्षता और संविधान के अनुच्छेद 25 में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की है। श्री मोदी की सरकार ने तीन वर्षों में स्थापित किया है कि राजनीति की बुनियाद सामाजिक समरसता, धर्मनिरपेक्षता और सभी समूहों और जातियों की साझेदारी पर निर्भर है। इसी मान्यता के आधार पर विषमतारहित समाज-व्यवस्था के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में स्पष्ट रुप से उल्लिखित है। श्री मोदी सरकार ने किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं बरता है। सरकार अनेक निर्णयों से प्रचलित विषमताओं के निराकरण हेतु विभिन्न उपायों को अपना रही है। सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक रुप से कमजोर और वंचित वर्गों को शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में विशेषाधिकार देने की कार्रवाई की जा रही है। शिक्षा, रोजगार तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए उनके रास्ते के रोड़ों को वे हटाने के लिए अनेक निर्णय लिये हैं। श्री मोदी सरकार ने महसूस किया है कि आज की आवश्यकता यह है कि जो भी आर्थिक रूप से पीछे हैं उनके उत्थान के लिए विशेष उपाय किये जायँ।

मुद्दे की बात करो, बकवास न करो चीन

ओंकारेश्वर पांडेय
हाईलाइटर

बात तो बात से ही बनेगी। बेतुके बातों से बात बिगड़ेगी ही। तो बात करो, बकवास न करो चीन। पाकिस्तान के आतंकवादियों को शरण तुम दे रहे हो चीन।पूर्वोत्तर में भारतीय उग्रवादियों को हथियार तुम देते रहे हो चीन। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान को संरक्षण तुम दे रहे हो चीन। जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के खिलाफ ‘वीटो तुम ही कर देते हो चीन। भारत के इलाकों पर अवैध कब्जा तुमने कर रखा है- चीन। जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर भी कब्जा तुमने कर रखा है चीन। भारत की बढ़ती ताकत तुमसे देखी नहीं जा रही चीन। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने से सिर्फ तुम ही रोक रहे हो चीन। एनएसजी में भारत की सदस्यता को भी सिर्फ तुम ही रोक रहे हो चीन. मगर कब तक? बात करो, बकवास न करो चीन। भारत तुम्हारी धमकियों से डरने वाला नहीं है।
चीनी मीडिया आजकल रोज ब रोज भारत के खिलाफ आग उगल रहा है। और यह तब से और ज्यादा बढ़ा है, जबसे दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश की यात्रा की। दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा से बौखलाये चीन की शी जिनपिंग सरकार ने एक बार फिर हमलावर रुख कर अख्तियार कर लिया है। अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा मजबूत करने के इरादे से उसने अपने नक्शे में देश के इस पूर्वोत्तर राज्य की छह जगहों के नाम भी बदल डाले।
19 अप्रैल, 2017 को चीन ने ऐलान किया कि उसने भारत के पूर्वोत्तरी राज्य के छह स्थानों को आधिकारिक नाम दिया है। चीन ने यह कदम, दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को लेकर बीजिंग द्वारा भारत को कड़ा विरोध जताने के कुछ दिनों बाद उठाया। चीन का यह कदम अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा दोहराने का एक थोथा प्रयास है।
चीनी सरकार के साथ चीन की मीडिया का भारत के प्रति रुख लगातार धमकाने वाला है, जिससे भारत कतई नहीं डरने वाला। हाल ही में चीन के सरकारी मीडिया ने बीजिंग द्वारा अरुणाचल प्रदेश के छह स्थानों का नाम रखने पर भारत की प्रतिक्रिया को ‘बेतुका’ कहकर खारिज करते हुए चेताया कि अगर भारत ने दलाई लामा का ‘तुच्छ खेल’ खेलना जारी रखा तो उसे ‘बहुत भारी’ कीमत चुकानी होगी। दलाई लामा की अरूणाचल यात्रा से बौखलाये चीन ने इन छह स्थानों के ‘मानकीकृत’ आधिकारिक नामों की घोषणा कर पहले से जटिल चल रही स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है।
चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की खबर के अनुसार, चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने 14 अप्रैल को घोषणा की थी कि उसने केंद्र सरकार के नियमों के अनुरूप ‘दक्षिण तिब्बत’ (अरुणाचल प्रदेश) के छह स्थानों के नामों का चीनी, तिब्बती और रोमन वर्णों में मानकीकरण कर दिया है। रोमन वर्णों का इस्तेमाल कर रखे गए छह स्थानों के नाम वोग्यैनलिंग, मिला री, कोईदेंगारबो री, मेनकुका, बूमो ला और नमकापब री हैं। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत कहता है। जबकि सच तो ये है कि यह भारत का अक्साई चिन क्षेत्र है, जिसे चीन ने वर्ष 1962 के युद्ध में कब्जा लिया था। अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर भारतीय राज्य है। हिन्दी में अरुणाचल का अर्थ है – अरूण और अंचल यानी “उगते सूर्य का पर्वत”। अरुणाचल प्रदेश की सीमाएँ दक्षिण में असम दक्षिणपूर्व मे नागालैंड पूर्व मे बर्मा/म्यांमार पश्चिम मे भूटान और उत्तर में तिब्बत से मिलती हैं। ईटानगर राज्य की राजधानी है। प्रदेश की मुख्य भाषा हिन्दी और असमिया है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वोत्तर के राज्यों में यह सबसे बड़ा राज्य है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह इस प्रदेश के लोग भी तिब्बती-बर्मी मूल के हैं।
इस अरुणाचल प्रदेश में दलाई लामा की यात्रा को लेकर दैनिक ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि दलाई लामा का कार्ड खेलना नई दिल्ली के लिए कभी भी अक्लमंदी भरा चयन नहीं रहा है। तो भइया ये धमकी का खेल खेलना चीन के लिए कब से अक्लमंदी की बात होने लगी।
चीन की धमकी भारत कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। आज भारत सन 1962 का भारत नहीं है। चीन अगर अपनी सैन्य ताकत के भरोसे यह धमकी दे रहा है, तो उसे बाज आना चाहिए। क्योंकि स्वभाव से ही शांति प्रिय रहा देश भारत अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी भी स्तर पर जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला नया भारत ऐसी धमकियों का करारा जवाब देने में सक्षम है। इसलिए बजाय धमकी, छल और झूठ के चीन को सच स्वीकारते हुए भारत के उस 90 हजार वर्ग मील के इलाके को खाली करने की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, जिसे उसने अवैध तरीके से अपने कब्जे में कर रखा है।
भारत एक बड़े दिल वाला उदारवादी राष्ट्र है। भारत ने बांग्लादेश के साथ भूमि विवाद को बड़ी उदारता से निपटाया है। चीन को भारत के इस रुख से सीखना चाहिए।

चीनी मीडिया कहता है कि, ‘दक्षिण तिब्बत ऐतिहासिक रूप से चीन का हिस्सा रहा है और वहां के स्थानों के मानकीकृत नाम रखना जायज है।’ चीन का यह दावा सरासर गलत, बेबुनियाद और झूठ पर आधारित है। अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताने वाला चीन पहले तो तिब्बत की संप्रभुता ही स्वीकार कर ले। इतिहास गवाह है कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था और उसे चीन ने जबरन कब्जा लिया।

दरअसल चीन को एक परिपक्व राष्ट्र की तरह बर्ताव करते हुए सीमा विवाद के व्यावहारिक हल पर ध्यान देना चाहिए। भारत-चीन अब तक सीमा विवाद को हल करने के लिए विशेष प्रतिनिधियों के साथ 19 वार्ताएं कर चुके हैं। पर कोई नतीजा नहीं निकला।

बजाय वार्ता को आगे बढ़ाने के चीन दलाई लामा हालिया अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को बेवजह मुद्दा बना रहा है। दलाई लामा की यात्रा उनके तवांग के रास्ते तिब्बत छोड़ने और भारत में शरण मांगने के बाद सातवीं यात्रा थी। 81 वर्षीय तिब्बती आध्यात्मिक नेता की यात्रा के दौरान चीन ने भारत को चेतावनी दी थी कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता और हितों की रक्षा के लिए ‘जरूरी कदम’ उठाएगा।

चीन के सरकारी मीडिया ने कहा कि अगर भारत, दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश की यात्रा करने की अनुमति देकर घटिया खेल खेलता है तो चीन को भी ”ईंट का जवाब पत्थर से देने में” हिचकना नहीं चाहिए। दो अंग्रेजी अखबारों-चाइना डेली और ग्लोबल टाइम्स ने भारत के गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू के बयान के बाद भारत पर तीखा हमला बोला। धमकी किसे दे रहे हो भाई। भारत तुम्हारे पत्थर का जवाब लोहे से दे सकता है चीन, किसी गलतफहमी में न रहो। भारत के केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू, जो स्वयं अरुणाचल प्रदेश से आते हैं, ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश, जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है, वह ”भारत का अभिन्न हिस्सा है।” रिजिजू की टिप्पणियों पर इन अखबारों ने कहा कि भारत दलाई लामा का इस्तेमाल चीन के खिलाफ एक ‘रणनीतिक हथियार’ के रूप में कर रहा है, क्योंकि चीन ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के खिलाफ ‘वीटो जैसे मजबूत’ अधिकार का इस्तेमाल किया है।

बीते कई हफ्तों से दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे को लेकर भारत और चीन के बीच वाकयुद्ध चल रहा है। चीन ने भारत पर इस दौरे की इजाजत देकर द्विपक्षीय रिश्तों को ‘गंभीर नुकसान’ पहुंचाने का आरोप लगाया तो नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया कि यह एक धार्मिक गतिविधि है। दलाई लामा के दौरे को लेकर चीन ने बीजिंग में भारतीय राजदूत विजय गोखले को बुलाकर अपना विरोध भी दर्ज कराया। लेकिन वह कुछ भी करे, उसका यह दावा बुनियाद रूप से गलत और दोषपूर्ण है क्योंकि इसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।
अरुणाचल प्रदेश के लोग बौद्ध धर्म – जो तिब्बत, चीन और दुनिया के कई हिस्सों में भारत से ही गया है – की उसी शैली का अनुकरण करते हैं जो तिब्बत, भूटान, सिक्किम और लद्दाख में चलन में है। इसलिए भारतीय इलाकों पर चीन के दावे का कोई धार्मिक आधार नहीं बनता।

चीन की इस कुटिल चाल को नाकामयाब करने के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय ने ठीक जवाब दिया कि भारतीय इलाके की जगहों को चीनी या तिब्बती नाम देने से वे चीन की नहीं हो सकतीं।

लेकिन चीन के लिए भारत की ओर से इतना जवाब दे देना भर काफी नहीं होगा। भारत को पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और सतर्कता और मजबूत करनी होगी।

कश्मीर में अंदरुनी तत्वों के जरिये पाकिस्तान की कारस्तानियां और ठीक इसी समय अरुणाचल प्रदेश पर चीन का यह रुख दोनों देशों की भारत के खिलाफ सोची समझी साझा साजिश का संकेत देती हैं।

चीन का यह रुख इसलिए भी है क्योंकि भारत ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बॉर्डर वन रोड में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी है और वह चीन की सीपीईसी परियोजना का विरोध भी कर रहा है। क्योंकि इसके तहत बन रही परियोजनाओं का कुछ हिस्सा जम्मू-कश्मीर के उस इलाके से भी होकर गुजर रहा है जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। इसलिए चीन इस मुद्दे पर जो सम्मेलन आयोजित कर रहा है उसमें अपना प्रतिनिधि भेजने की बजाय भारत को सीमाई इलाकों में सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाने चाहिए।

चीन के अखबार और पत्रकार चीन सरकार के इशारों पर नाचते हैं। भारत में मीडिया स्वतंत्र है। निष्पक्ष भी है। भारतीय मीडिया जहां चीन के मामले पर गंभीर और संतुलित विचार रख रहा है, वहीं चीनी मीडिया का रुख लगातार चेतावनी और धमकी भरा रहता है। यह कौन सी पत्रकारिता है? चीन की मीडिया का करारा जवाब भारतीय मीडिया दे सकता है। पर क्या इससे सीमा विवाद हल हो जाएगा?

बात तो बात से ही बनेगी। बेतुके बातों से बात बिगड़ेगी ही। तो बात करो, बकवास न करो चीन। पाकिस्तान के आतंकवादियों को शरण तुम दे रहे हो चीन. पूर्वोत्तर में भारतीय उग्रवादियों को हथियार तुम देते रहे हो चीन. आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान को संरक्षण तुम दे रहे हो चीन. जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के खिलाफ ‘वीटो तुम ही कर देते हो चीन. भारत के इलाकों पर अवैध कब्जा तुमने कर रखा है- चीन. जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर भी कब्जा तुमने कर रखा है चीन. भारत की बढ़ती ताकत तुमसे देखी नहीं जा रही चीन. भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने से सिर्फ तुम ही रोक रहे हो चीन. एनएसजी में भारत की सदस्यता को भी सिर्फ तुम ही रोक रहे हो चीन. मगर कब तक? बात करो, बकवास न करो चीन। भारत तुम्हारी धमकियों से डरने वाला नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और असम-अरुणाचल प्रदेश समेत पूर्वोत्तर राज्यों में छह साल तक रहकर पत्रकारिता कर चुके हैं) संपर्क – editoronkar@gmail.com

डाॅ॰ अम्बेडकर मध्यम मार्गी थे वे आजीवन जाति के ध्वंस और गैर बराबरी की समाप्ति के लिए संघर्षशील रहे- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

पटना 15 अप्रैल, 2017
डाॅ॰ अम्बेडकर ने सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक जनतंत्र एवं राज्य-समाजवाद की वकालत की। वे जनतंत्र को न केवल एक औपचारिक राजनैतिक ढांचा, वरन् एक व्यावहारिक मानवीय भावना के रूप में भी स्थापित करना चाहते थे। इसके लिए समाज के सभी सदस्यों में अन्यों के प्रति समानता एवं आदर का भाव और सामाजिक बंधनों से मुक्त एक सामाजिक संगठन का होना आवश्यक है। सामाजिक जनतंत्र की यह आवश्यकता डाॅ॰ अम्बेडकर को राज्य-समाजवाद की ओर ले जाती है, जहाँ न केवल राजनैतिक, वरन् सामाजिक एवं आर्थिक समानता का भी प्रावधान है। साथ ही वे राज्य के लिए समाजवाद की स्थापना को संवैधानिक रूप से बाध्यकारी बनाना चाहते थे।
डा॰ मिश्र ने कहा कि डाॅ॰ अम्बेडकर ने कहा था कि उपनिषदों की रचना क्षत्रियों ने की थी। उपनिषद् विद्या के प्रख्यात सिद्धांतकार प्रवाहण जैबिल, अश्वपति-कैकेय, अजातशत्रु-काशेय और जनक-विदेह थे। बहुत से विद्वान गीता को भी उपनिषद् मानते हैं। उपनिषदों का निचोड़ और सार तत्व भगवद् गीता में है। उनके अनुसार कानून की किताबों की रचना ब्राह्मण सिद्धांतकारों ने की है, लेकिन इन कानूनों को क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र शासक वर्ग लागू करते रहे हैं। लेकिन बौद्ध धर्म और जैन धर्म को क्रान्तिकारी और प्रगतिशील कहकर इनकी प्रशंसा करते हैं। उदारता और क्रान्तिकारी विचारों के बावजूद न तो इन दोनों महापुरूषों या इनके अनुयायियों बौद्ध या जैन शासकों ने हिन्दू कानून को बदला और न ही जाति-व्यवस्था को इन्होंने नष्ट किया। उनके अनुसार बौद्ध और जैन शासकों ने कोई कानून ही नहीं बनाये, केवल पुराने कानूनों को ही लागू किया। बौद्धों के शासनकाल के दौरान वर्ण-दर्शन में क्षत्रियों का स्थान ब्राह्मणों से उपर हो गया, जबकि ब्राह्मण दूसरे स्थान पर आ गये थे। बौद्ध शासक चाहते तो वे आपत्तिजनक कानून को समाप्त कर संशोधित परिवर्Ÿानकारी कानून बना सकते थे। जाति या वर्ण-व्यवस्था को जारी रखने के कलंक से बौद्ध, जैन शासक और सिद्धांतकार दोनों ही नहीं बच सकते हैं। ब्राह्मण विद्वान और नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में सन् 1944 में डा॰ अम्बेदकर को आमंत्रित कर उनका शानदार स्वागत किया था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें भारत सरकार का विधि मंत्री एवं संविधान सभा में संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। महात्मा गाँधी एवं पंडित नेहरू एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानी नेताओं के विचारों का संकलन डा॰ अम्बेडकर ने अपने विचारों को सम्मिलित कर संविधान का प्रारूप संविधान सभा में प्रस्तुत किया जिसे संविधान सभा ने स्वीकृत किया। आज भारत का लोकतंत्र डा॰ अम्बेदकर के विचारों पर आधारित है।
डा॰ मिश्र ने कहा कि यह तथ्य भी देखने को मिलती है। बाबा साहब अम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित कई धारणाओं का खंडन किया है, जो कि सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करने में मददगार है। डाॅ॰ अम्बेडकर ने लिखा है-‘‘शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे, आर्यों के शत्रु थे। आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया था। ऐसा था, तो ‘यजुर्वेद’ और अथर्ववेद’ के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा क्यों प्रकट करते हैं? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था। ऐसा था, तो शूद्र ‘ऋग्वेद’ के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था, तो सुदास ने अश्वमेघ यज्ञ कैसे किया था? ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे सम्पत्ति संग्रह नहीं कर सकते। ऐसा था, तो ‘मैत्रायणी’ और ‘कठक’ संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों का उल्लेख कैसे है। रैयदास जैसे अनेक संतशूद्र दलित हैं जिन्हें सवर्ण पूजते रहे हैं।
डा॰ मिश्र ने कहा कि यह सर्वविदित है कि अत्यंत पवित्र वेदों के निष्णात ज्ञाता वेद व्यास शूद्र थे। यदि वेदों में शूद्रों और गैर ब्राह्मणों के विरूद्ध कुछ भी लिखा गया है तो उसके लिए सवर्ण को जिम्मेदार क्यों ठहराया जा रहा है? वेद व्यास शुद्र के पुत्र थे। महाभारत और 18 पुराणों की संस्कृत में रचना की थी। यदि महाभारत और पुराणों में शूद्रों के विरूद्ध अन्यायपूर्ण बातें लिखी गयीं तो उसके लिए सवर्ण को उत्तरादयी नहीं ठहराया जा सकता है। हिन्दू समाज व्यवस्था के संचालक तत्व भगवद् गीता में हैं। गीता वर्ण-व्यवस्था अर्थात् जाति-व्यवस्था को वर्णित करती है। उन्होंने कहा था कि ‘‘हर समस्या का समाधान संवैधानिक होना चाहिए, अन्यथा अराजकता फैल जायेगी।’’ उन्होंने देश की स्वाधीनता की रक्षा की जरुरत पर बल देते हुए देशवासियों का इन शब्दों में आह्वान किया था, ‘‘रक्त की अंतिम बूंद तक हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए।’’ डाॅ॰ अम्बेदकर मध्यम मार्गी थे और सामान्य लाभ का मार्ग अपनाना ठीक समझते थे। सामान्य लाभ का सिद्धांत डाॅ॰ अम्बेदकर की दृष्टि में, व्यक्ति प्रधान और समाज-प्रधान सिद्धांतों में एक समझौता है। उनका मानना था कि मानव-हित व्यक्तिगत एवं समाजवाद और आदर्शवाद एवं यथार्थवाद में निहित है। व्यक्तिगत एवं सामजिक उद्देश्यों का सामंजस्य मुख्यतः कानून-व्यवस्था के बिना छिन्न-भिन्न हो सकता है।

गांधीजी के आदर्श आज भी प्रासंगिक

जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री (बिहार)

15 अप्रैल, 1917 को महात्मा गांधीजी का चम्पारण पहुँचना, एक युगांतकारी घटना साबित हुई। गांधीजी के तब के प्रयोगों को लेकर आज जब सौ साल बाद हम चर्चा कर रहे हैं तो यह देखना और समझना जरूरी है कि चम्पारण में न कहीं लाठी चली, न बंदूक, न किसी को लम्बी जेल भुगतनी पड़ी, न जानलेवा अनशन हुआ, न चंदा और न दिखावे का खर्च करना पड़ा। गांधीजी ने चम्पारण से एक भी पैसा चंदा नहीं जुटाने दिया। दरअसल, इसी आंदोलन के जरिये गांधीजी ने रचनात्मक और सभ्यतागत विकल्प के अपने प्रयोग की विधिवत शुरूआत की, जिसमें उनकी इच्छा अंग्रेजी शासन से ही नहीं निलहों से भी सहयोग लेने की थी, जो पूरी नहीं हुई। भारत की जंगे-आजादी के इतिहास में चंपारण सत्याग्रह को मील का पत्थर माना गया है। इसी आंदोलन की वजह से देशवासियों ने गाँधीजी को महात्मा के तौर पर पहचाना। गाँधीजी ने यहीं से अहिंसा को एक कामयाब विचार के रूप में रोपा। यह प्रयोग कई मायनों में विलक्षण था और गांधीजी के दम को बताने के साथ ही अन्याय सहने वाले जीवंत समाज में प्रतिरोध की शक्ति के उभरने और खुद गांधीजी द्वारा अपनी पूरी ईमानदारी, निष्ठा, दम और समझ के साथ स्थानीय लोगों और समस्याओं से एक रिश्ता जोड़ने और उन हजारों-लाखों द्वारा झट से गांधीजी पर भरोसा करके उनको अपनाने की दिलचस्प दास्तान भी है। यह अहिंसात्मक ढंग से जनता की भागीदारी और सत्य पर आधारित आंदोलन की अन्याय विरोधी शक्ति को रेखांकित करने वाला पहला प्रयोग है। निजी स्तर पर और कई बार सामूहिक स्तर पर इस शक्ति और रणनीति के प्रयोग का उदाहरण भारतीय समाज में पहले भी दिखता है पर गांधीजी ने चम्पारण से उसके प्रयोग की जो शुरूआत की वह विदेशी सामानों के विरोध, खिलाफत और असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह से होते हुए 1942 के जन-विद्रोह तक पहुँचती है। उन्होंने रचनात्मक विकल्प का जो प्रयोग किया, उसमें भी आज टिकाऊ विकास और वैकल्पिक विकास नीति की खोज कर रही जमातें अपने लिए एक माॅडल देख रही हैं। आज विकास और जीवनशैली के मौजूदा माॅडल की कमजोरियों और सीमाओं को जानकर इसका विरोध करने वाले दुनिया की विविधताओं का, टिकाऊ विकास के माॅडल का, विकेन्द्रीकरण का, स्थानीय समूहों का उनके प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को उसी तरह स्वीकार करने लगे हैं, जो गांधीजी के दर्शन और आचरण का केन्द्रीय तत्व है। गांधीजी अब तक दुनिया भर में अन्याय का प्रतिरोध करने वाली जमातों में, अहिंसक विरोध आंदोलनों में, पश्चिमी माॅडल के लोकतंत्र का विकल्प चाहने वालों के लिए प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। आज भी वे एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था चाहने वालों की आशा के केन्द्र में हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि गांधी को, उनके आंदोलनों को, उनके प्रयोगों को ज्यादा बारीकी से देखा जाए और अपनी जरूरतों के लायक समाधान या समाधान तक ले जाने वाली राह तलाशी जाय। 15 अप्रैल, 1917 को राज कुमार शुक्ल जैसे एक अनाम-से आदमी के साथ गांधीजी नाम का आदमी चम्पारण आया था। गांधीजी वर्षों बाद स्वदेश लौटे थे, चम्पारण का नाम भी नहीं सुना था और नील की खेती के बार में न के बराबर जानते थे। राज कुमार शुक्ल गांधीजी को नील किसानों की दुरवस्था दिखाने के लिए चम्पारण ले गये। गांधीजी ने यहाँ आकर वह सब देखा जो गुलामी की बीमारी के विषाणु थे। आज गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनका दिया हुआ सत्याग्रह-मंत्र कमजोर और बेबस लोगों की ताकत है। हमारा सुलभ-स्वच्छता-आंदोलन पूर्णतः गांधी-दर्शन एवं कार्य पर आधारित है। मैं राष्ट्रपिता गांधीजी के पदचिह्नों पर पर चलकर सामाजिक परिवर्तन का कार्य करता रहा हूँ।
भारत के सफल स्वातंत्र्य संग्राम के इतिहास में बिहार का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणा प्रद रहा है। चाहे धार्मिक राजनीति हो अथवा विशुद्ध संवैधानिक उग्र क्रांतिकारी विस्फोट हो या फिर गांघीजी के अनुप्रेरक नेतृत्व में सत्याग्रह, इस सभी में बिहार की महत्वपूर्णदेन रही है। सरकारी प्रलेखों, पत्रों, अप्रकाशित अभिलेखों तथा निजी पत्राचारों सहित सभी उपलब्ध सूत्रों पर आधारित होने के फलस्वरूप यह सर्वथा प्रामाणिक भी है। गांधीजी ने सत्याग्रह का पहला प्रयोग चंपारण से किया हा,े किन्तु उसे जो किया उसका सर्वाधिक महत्व है। यह सत्याग्रह हमारे स्वतंत्रता संग्राम का, जिसका गांधीजी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रमुख उपकरण बन गया। विभिन्न चरणों में बिहार की जनता ने उपयुक्त हिस्सा लिया। गांधीजी कहा था कि वे ऐसे भारत के निर्माण के लिए कोशिश करते रहंेंगे, जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी यह महसूस करे कि यह उसका देश है जिसके निर्माण में उसके आवाज का महत्त्व है। वे ऐसे भारत के लिए कोशिश करते रहे, जिसमें ऊँंच नीच का कोई भेद न हो। सभी जातियाँ मिल-जुल कर रहे। उनके भारत में, अस्पृष्यता व शराब तथा नशीली चीजों के अनिष्टों के लिए, काई स्थान न हो। उसमें स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार मिलेे। सारी दुनिया से भारत का संम्बन्ध शंति और भाईचारे का रहे। यह है उनके सपनों का भारत। उनकी सोच के अंतर्गत अभिप्राय है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों के समुचित विकास के समान अवसर उपलब्ध हो, किसी भी व्यक्ति का किसी भी रूप में शोषण न हो ओर उसके व्यक्तित्व केा एक पवित्र सामाजिक विभूति माना जाए, किसी परोक्ष लक्ष्य की सिद्धि का साधन-मात्र नहीं। उनकी सोच सामाजिक न्याय सुलभ करने के लिए यह आवश्यक है कि देश की राजसत्ता विधायी तथा कार्यकारी कृत्यों के द्वारा समतायुक्त समाज की स्थापना का प्रयत्न हो। सामाजिक न्याय के इस मूलभूत मानवीय सिद्धांत को संविधान में अनेक रूपों में मांन्यता मिली है। गांधी जी के अनुसार आर्थिक न्यााय के अभाव में सामाजिक न्याय कल्पना मात्र है। उनके अनुसार आर्थिक न्याय का अभिप्राय है कि धन-सम्पदा के आधार पर व्यक्ति-व्यक्ति के बीच विच्छेद की कोई दीवार खड़ी नहीं की जाए। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का अथवा एक वर्ग को दूसरे वर्ग का शोषण करने का अधिकार नहीं है।
गांधीजी की विशेषता की ओर हम नजर करें। दीर्घदृष्टा और महापुरूष कैसे होते हैं, इसका एक उदाहरण है कि इस समय अगर किसी को सरकार पर प्रहार करना है तो भी कोटेशन गांधीजी का काम आता है। किसी को अपने बचाव के लिए उपयोग करना है, तो भी कोटेशन गांधीजी का आता है। किसी को अपनी न्यूट्रल बात बतानी है तो भी कोटेशन गांधीजी का काम आता है। इसका मतलब उस महापुरूष में कितनी दीर्घदृष्टि थी, कितनी विजन था, कितने व्यापक फलक पर उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त किया था कि जो आज भी विरोध करने के लिए भी मार्गदर्शक है, शासन चलाने वाले के लिए भी मार्गदर्शक है। न्यूट्रल मूकरक्षक बैठे लोगों के लिए भी यह मार्गदर्शक है। विचार तो कई होते हैं, हर विचार एक ही खेमे के काम आते हैं। सब खेमों के काम नहीं आते। एक ही कालखण्ड के लिए काम आते हैं। सब कालखंड के लिए काम नहीं आते हैं। गांधीजी की विशेषता रही है कि उनके विचार हर कालखंड के लिए, हर पीढ़ी के लिए, हर तबके के लिए उपकारक रहे हैं। मतलब उन विचारों में ताकत है। तपस्या का एक अर्थ था जो राष्ट्र को समर्पित था और सौ साल के बाद का भी देश कैसा हो सकता है, यह देखने का समथ्र्य था। जब जा करके इस प्रकार की बात निकल पाती है और इसलिए सहज रूप से उस महापुरूष को नमन करने का मन होता बहुत ही स्वाभाविक है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट एवं संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी दो टूक शब्दों में कहा है कि अनुसूचित जातियों के पक्ष के बने कानून बेअसर रहने के कारण इन वर्गों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। इन वर्गों के प्रति उदासीनता दिखाई पड़ती है। अनुसूचित जातियों पर हिंसा रोकने के मामले में नौकरशाही का पक्षपात सामाजिक एवं आर्थिक कानूनों को लागू करने के संदर्भ में भी खुलकर सामने आ जाता है। यहाँ नौकरशाही ही अपराधी है जिसका नजरिया और व्यवहार दोनों तमाम स्तरों पर क्रियान्वयन की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सदियों से आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर जी रहे दलितों के प्रति समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों का नजरिया लोकतंत्र, समता और न्याय आदि की दृष्टि से नहीं बदला है। यह सुनना अत्यंत कष्टदायक लग सकता है। पर दलितों के मामले में क्या अगड़ा, क्या पिछड़ा सब के सब एक हैं। देश के कोने-कोने में दलित आज भी भीषण पीड़ा और प्रताड़ना की जिन्दगी झेल रहे हैं। दलित तबका राष्ट्र के विकास में अपनी सहभागिता ढूंढता है तो उसे मायूसी ही दीखती है और उसे विषमता शोषण एवं जुल्म सहने पड़ते हैं। गांधीजी के विचार के अनुसार 20वीं सदी के उन सिद्धांतों से उद्भूत हैं जिनमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, करूणा, मैत्री, न्याय जैसे नैसर्गिक मूल्यों का समावेश है, उन सिद्धांतों ने भारत की उस व्यवस्था, उन मूल्यों को झकझोर दिया है जो असमानता, असहिष्णुता, शोषण, दलन, दमन के उद्योतक थे। गांधीजी ने असमानता, सामन्ती मूल्यों को झकझोरा ही नहीं है अपितु संविधान के माध्यम से उनकी जड़ों को जर्जरित करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। गांधीजी के अनुसार संविधान की उद्देशिका में सम्पूर्ण संविधान के सार हैं, दर्शन सरल है। संविधान के सभी उपबंध उद्देशिका में निहित भावनाओं से स्फूर्ति ग्रहण करते हैं। इसमें जिन तथ्यों, सिद्धांतों तथा आदर्शों का निरूपण हुआ है वे समूचे संविधान में विद्यमान हैं। इतने हजारों साल का हमारा देश है, कमियाँ हमसो में आती हैं। कभी-कभी बुराइयाँ भी प्रवेश कर जाती हैं, लेकिन कुछ बात है कि हस्ती नहीं मिटती हमारी। यह जो हम बात बताते हैं उसकी मूल ताकत क्या है। मूल ताकत यह है हजारों साल पुराना ये समाज, इसमें एक (स्वचालित व्यवस्था) है। हमने देखा होगा, बुराइयाँ हमारे समाज में नहीं आई है, ऐसा नहीं है। बुराइयाँ आई है। कभी-कभी बुराइयों ने जड़ें जमा दी हैं, लेकिन उसी समाज में से लोग पैदा हुए हैं जिन्होंने बुराइयों को खत्म करने के लिए जिन्दगी खपा दी है। समाज के विरोध के बाद भी वो लड़े हैं और समाज की एकता और अखण्डता के लिए उन्होंने प्रयास किया है। समाज में समयानुकूल वे बदलाव लाये हैं।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आज भी गांधीजी की प्रासंगिकता है। गांधीजी के रास्ते ही चलकर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ा जा सकता है। समाज हिंसक हो रहा है, एक देश दूसरे देश केा हड़पने पर लगे हुए हैं। ऐसी परिस्थितियाँ अधिक दिनों तक नहीं चल सकती, क्योंकि मानव ही नहीं बल्कि समस्त प्राणियों का अस्तित्व संकट में आ जाएगा। अतः आज जो देश और दुनिया के सामने तमाम तरह की समस्याएं बढ़ती चली जा रही हैं, उसमें विश्व का एक बड़ा वर्ग सोचने लगा है कि गांधीजी के दिखाए रास्ते सिवाए कोई दूसरा रास्ता नहीं।