राष्ट्र-निर्माण हेतु आत्मानुषासन और नैतिक मूल्यों का परिपालन आवष्यक-राज्यपाल

पटना, 26 जुलाई 2017
‘‘भारतीयों का जीवन उच्च आदर्शों को समर्पित, संयम और सादगी का जीवन रहा है। आज चारित्रिक गुणों का परिवर्द्धन आवष्यक है। आत्मानुषासन चरित्र-निर्माण की रीढ़ है। नैतिक मूल्यों और मर्यादा से ही सामाजिक बुराइयों पर अंकुश लग सकता है। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ विचार -जीवन और जगत् को भयमुक्त बनाते हैं।’’ -उक्त विचार, महामहिम राज्यपाल-सह-कुलाधिपति श्री केषरी नाथ त्रिपाठी ने स्थानीय एस॰के॰ मेमोरियल हाॅल में आयोजित नालन्दा खुला विष्वविद्यालय के ‘ग्यारहवें दीक्षान्त समारोह’ को अध्यक्षीय पद से संबोधित करते हुए व्यक्त किये।
राज्यपाल श्री त्रिपाठी ने कहा कि बिहार में कई इतिहास-प्रसिद्ध और गौरवषाली विष्वविद्यालय स्थापित रहे हैं। नालन्दा एवं विक्रमशिला के प्राचीन विश्वविद्यालय इसी राज्य में पल्लवित एवं पुष्पित हुये। प्राचीन धर्म, दर्शन एवं साहित्य के क्षेत्र में भी इस राज्य ने विश्व को प्रभावित किया। विश्व का प्रथम एवं प्राचीनतम गणराज्य (वैशाली का लिच्छवी गणराज्य), इसी राज्य में स्थापित एवं विकसित हुआ। आधुनिक युग में भी गाँधीजी ने बिहार से ही अपनी कर्म-यात्रा का श्रीगणेश किया था। गाँधीजी के सत्याग्रह के प्रथम प्रयोग, जिसे हम ‘चम्पारण सत्याग्रह’ (1917) के नाम से जानते हैं का शताब्दी-वर्ष हम आयोजित कर रहे हैं। यह हमारे लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ॰ राजेन्द्र प्रसाद एवं भारतीय संविधान-निर्मात्री-सभा के अन्तरिम अध्यक्ष डाॅ॰ सच्चिदानन्द सिन्हा की जन्मस्थली बिहार ही है। अतः निःसंदेह बिहार की मिट्टी में महापुरुषों को जन्म देने एवं उन्हें महानता के षिखर पर पहुँचाने की क्षमता रही है। आज पुनः हमें अपनी गौरवषाली विरासत का सादर स्मरण कर, वर्तमान को सजाते-सँवारते, नये स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के लिये दृढ़संकल्पित और क्रियाषील हो जाने की जरूरत है।
राज्यपाल श्री त्रिपाठी ने, 33 वर्ष की अत्यन्त कम उम्र मंे ही कलकत्ता विष्वविद्यालय के कुलपति बने डाॅ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संबोधन के एक अंष को उद्धृत करते हुए कहा कि भारतीय विष्वविद्यालयों को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के एक जीवन्त अंग के रूप में अपनी महत्ता को सदैव स्मरण रखना चाहिए। जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक-दोनों उद्देष्यों की प्रतिपूर्ति की दिषा में इन्हें तत्पर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभूमि की समृद्धि और मानव सभ्यता की उच्चतम परम्पराओं को वर्द्धमान बनाये रखने में विष्वविद्यालयों की अग्रणी भूमिका है।
राज्यपाल ने कहा कि ‘दीक्षान्त समारोह’ का प्रत्येक क्षण वस्तुतः अविस्मरणीय होता है। यह वास्तव में पढ़ाई का अन्त नहीं है, बल्कि यह जीवन की सुदीर्घ यात्रा का एक पड़ाव है। श्री त्रिपाठी ने नालन्दा विष्वविद्यालय की प्रषंसा करते हुए कहा कि समय पर परीक्षा, निर्धारित तिथि को परीक्षाफल सहित अनेक विशेषताएँ इसे देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की श्रेणी में स्थापित करती हैं। सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में भी यह विश्वविद्यालय सजग रहा है। राज्यपाल ने कहा कि उच्च षिक्षा को ग्रामीण स्तर तक पहुँचाने के उद्देष्य से इस विष्वविद्यालय द्वारा प्रखण्ड स्तरीय अध्ययन केन्द्र खोला जाना भी सराहनीय है। उन्होंने ‘दीक्षान्त समारोह’ में उपाधि ग्रहण करनेवाले सभी विद्यार्थियों को अपनी शुभकामनाएँ एवं बधाई दी।
कार्यक्रम में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री प्रकाष जावेडकर के वीडियो संदेष को भी प्रदर्षित किया गया, जिसमें उन्होंने कहा कि षिक्षा का मूल उद्देष्य अच्छे इंसान का निर्माण है। कार्यक्रम में दीक्षान्त-भाषण देते हुए बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ॰ लालजी सिंह ने कहा कि विष्वविद्यालयों को प्राप्त स्वायत्तता बहाल रहनी चाहिए। उन्होंने युवा शक्ति का राष्ट्रीय नव निर्माण में सदुपयोग करने का आह्वान किया। कार्यक्रम में विष्वविद्यालय का प्रगति-प्रतिवेदन विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो॰ रवीन्द्र कुमार सिन्हा ने प्रस्तुत किया, जबकि धन्यवाद-ज्ञापन कुलसचिव डाॅ॰ एस॰पी॰ सिन्हा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में राज्यपाल ने विभिन्न विषयों में स्वर्ण पदक प्राप्त करनेवाले विद्यार्थियों को पदक एवं उपाधियाँ प्रदान की।

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