‘‘जातिवाद और सांप्रदायिकतावाद’’लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरे का संकेत

पटना, 16 अगस्त, 2016

कल 71वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के तत्वावधान में बिहार आर्थिक अध्ययन संस्थान के सभागार में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के उपरान्त ‘‘जातिवाद और सांप्रदायिकतावाद’’लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरे का संकेत विषय पर आयोजित परिसंवाद को सम्बोधित करते हुए प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डा॰ जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूलभूत अवधारणा है। जहाँ भारत के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी है। किन्तु राज्य (शासन) की दृष्टि में किसी व्यक्ति के धर्म या विश्वास की कोई महŸाा नहीं है क्योंकि राज्य (शासन) की दृष्टि में सभी लोग समान हैं और समान ढंग के व्यवहार के हकदार हैं। कोई भी राजनीतिक दल धार्मिक दल नहीं बन सकता। राजनीति और धर्म को एक साथ नहीं मिलाया जा सकता। कोई भी राज्य, सरकार यदि धर्मनिरपेक्षता से भिन्न नीति अपनाती है या धर्मनिरपेक्षता से भिन्न कार्य करती है, तो वह संवैधानिक मान्यता के विपरीत है, और वह अपने को अनुच्छेद 356 के अधीन कार्रवाई के लिए पात्र बनाती है।’’ उच्चतम न्यायालय के निर्णय का आधार संभवतः महात्मा गांधी की वह उक्ति है जिसके अनुसार ‘धर्मनिरपेक्षता’ सभी धर्मों का समान आदर करना है, समान अनादर करना नहीं। उनकी अपनी परिभाषा यह है कि यह व्यक्तियों और व्यक्तियों व संस्थाओं के बीच के कारोबार की एक प्रणाली है, जिसमें कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष की धार्मिक आस्थाओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं रहता और जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके धर्म या जाति पर विचार किये बिना समान अवसर उपलब्ध है। संप्रभु राज्य का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे, क्योंकि हरेक नागरिक अपना विषेषाधिकार संप्रभु के हवाले करता है। धर्मनिरपेक्षता प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है और उसे अपने दिमाग की षांति, नैतिक बल, आषा तथा उम्मीद किसी भी स्रोत से हासिल करने की आजादी है। इस मामले में हम महात्मा गांधी द्वारा कही गयी बात याद करें। ‘ईष्वर अल्लाह तेरे नाम’, प्रत्येक धर्म हमें सिखाता है कि ईष्वर हम में से प्रत्येक में है और वह इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता। इसलिए यह कहना कि मेरा ईष्वर सबसे महान है, अपने ईष्वर का ही सम्मान कम करना है।
श्री रामउपदेश सिंह, भा॰प्र॰से॰ (अ॰प्रा॰) ने कहा कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय आधार पर सामाजिक सद्भाव एवं समरसता को खंडित कर राजनीति नहीं चलायी जा सकती। यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि राजनीति की बुनियाद सामाजिक समरसता, धर्मनिरपेक्षता और सभी समूहों और जातियों की साझेदारी पर निर्भर है। इसी मान्यता के आधार पर विषमतारहित समाज-व्यवस्था के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में स्पष्ट रुप से कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं बरतेगी। सरकार को इस निर्णय से प्रचलित विषमताओं के निराकरण हेतु विभिन्न उपायों से सक्षम बनाया जा सकता है। इसमें सबसे अधिक लोकप्रिय तरीका ‘‘सकारात्मक पक्षपात’’ है। सकारात्मक पक्षपात का अर्थ होता है सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक रुप से कमजोर और वंचित वर्गों को षिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में विषेषाधिकार देना।
श्री बच्चा ठाकुर भा॰प्र॰से॰ (अ॰प्रा॰), ने कहा कि आज हम अतीत के सांप्रदायिकता की काली छाया से पिछले तीन वर्षो में बहुत हद तक उबरने लगे हैं, अब राष्ट्र की फिजां एकता की डोर में बंधने लगी है। हम अपने पुराने गौरव की ओर लौट रहे हैं। भाजपा (भविष्य) समाज के साथ और भाईचारे की भारत लिखेगा। पिछले तीन वर्षों में अल्पसंख्यकों के लिए एक माहौल बना है, अगर यही रफ्तार रही तो भारत के मुसलमान पूरी तरह से हीन भावना से निकल आएँगे।
श्री श्याम बिहारी मिश्र ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता लगाातार जाहिर करते रहे हैं। जहाँतक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिमों में असुरक्षा की बात है। इसके प्रतिकूल परिणामों से सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुँच रहा है। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सबों पर है। श्री रघुवीर मोची ने कहा है कि आज की आवष्यकता यह है कि जो भी आर्थिक रूप से पीछे हैं उनके उत्थान के लिए विषेष उपाय किए जाएं। वे चाहे किसी भी जाति, वर्ग, समुदाय या क्षेत्र के हों। आर्थिक आधार पर आरक्षण सभी निर्धनों-पिछड़ों के लिए हितकारी तो होगा ही, वह समाज में किसी प्रकार का द्वेष भी पैदा नहीं करेगा। आजादी के तुरंत बाद तो जातिगत आधार पर आरक्षण का औचित्य बनता था, क्योंकि तब अनेक समुदायों के पिछड़ेपन का मुख्य कारण उनकी जाति थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
इस परिसंवाद में भाग लेने वालों में प्रमुख थे:- डाॅ॰ ज्योतिन्द्र चैधरी, रामउदार झा, शेखर राम, भरत त्रिपाठी, जयनारायण प्रसाद, अनवार खाँ, कृष्ण कुमार ठाकुर, रामप्रवेश यादव, आदि जिन्होंने अपने विचार प्रकट किये।

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