डा॰ जगन्नाथ मिश्र
रिपोर्ट के अनुसार आजादी के 70 वर्ष बाद भी दलित-आदिवासी और हाशिये पर रहे तबकों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई है और न ही वे सच्चे अर्थों में आजाद हुए हैं। आज भी देश के हर कोने से आये दिन दलित उत्पीड़न की घटना देखने को मिलती है। प्रायः दलितों को संरक्षण देने के नाम पर अनेक कानून और संस्थाओं का निर्माण किया लेकिन, उचित एजेंडे और समन्वय की भावना के अभाव में इन्हें दिशा दे नहीं पाये हैं। देश की किसी भी राज्य की सरकार ने इसकी सुध नहीं ली हैं। रिपोर्ट आने के पश्चात सत्ता पक्ष और विपक्ष इस पर बहस करेंगे, जो अच्छी बात है। किन्तु कोई सार्थक दिशा ली जाएगी, इसकी संभावना कम ही है। अनुसूचित जाति और जनजाति के वर्गों के लोगों में जागरूकता लाने तथा निःशुल्क विधिक सहायता देने जैसे कार्यों से दलित उत्पीड़न रोका जा सकता है। फिर स्थायी बदलाव के लिए समाज की मानसिकता में बदलाव लाना भी जरूरी है। सामाजिक सोच बदलने के लिए सम्बधित सूचना और ज्ञान सम्पन्न होना जरूरी है। तभी नये विचारों के लिए मानसिकता तैयार हो सकेगी। अशिक्षित समाज में ही रूढ़ियों और कुरीतियों का जन्म होता है। आज भी जहाँ दलित बहुसंख्यक इलाके हैं, वहाँ शिक्षा की कमी है। वहाँ साक्षरता बढ़ाने के विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे, जिससे दलित वर्ग में जागरूकता आएगी। 1989 के अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में एक विशेष बदलाव कर इसमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक आमजन की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत हैं, न कि इस पर बेनतीजा राजनीतिक बहस की। दरअसल, समाज के स्तर पर ही उत्पीड़न के खिलाफ जबर्दस्त वातावरण निर्मित करने की जरूरत है।
डा॰ मिश्र ने अपने पत्र में कहा कि रिपोर्ट के अनुसार क्या गरीब एवं पीड़ित परिवार के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा इसलिए नहीं मिलेगी कि उसका जन्म एक गरीब दलित परिवार में हुआ? क्या एक लोकतांत्रिक और लोक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी अपने तमाम बच्चों को गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं है? क्या राज्य अपने इस दायित्व से भाग सकता है? अगर हम भारतीय राज्य का आकलन समान, सार्वजनिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के आधार पर करें तो भारत ने अपने ही बच्चों के साथ पर्याप्त भेदभाव किया है। आज पूरे देश में बहुस्तरीय शिक्षा व्यवस्था कायम है। बच्चे के परिवार की जो सामाजिक-आर्थिक हैसियत होती है, उसे शिक्षा भी उसी स्तर की मिल रही है। फिर शिक्षा की भाषा और गुणवत्ता, स्कूल की प्रकृति सब मिलकर बच्चे का भविष्य तय कर देते हैं, जिसमें बच्चों को मिलने वाले रोजगार की प्रकृति और चरित्र भी शामिल है। एक तरफ, अमीर बच्चों के लिए सारी सुविधाओं से लैस अंगरेजी माध्यम वाले निजी विद्यालय हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चे की पूरी पढ़ाई रोजगार की वैश्विक प्रकृति के अनुकूल होती है। वहीं गरीब दलित बच्चों को साधनविहीन सरकारी विद्यालयों के हवाले कर दिया गया है, जहाँ बहुत सारे अप्रशिक्षित और कम वेतन वाले पैरा शिक्षक हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में जैसे-तैसे शिक्षण कर्म का निर्वाह करते हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे साधनहीनता और शैक्षणिक वातावरण के अभाव में स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। जो बचते हैं उनमें दसवीं कक्षा के बाद पढ़ाई की इच्छाशक्ति नहीं रह जाती है।

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