कुंठा छोड़ो – स्वाभिमानी बनो

आज़ादी के 70 साल बाद भी भारत के दलित, आज़ादी से लेकर अब तक चले आ रहे राजनैतिक व्यवस्था के कारण अभी भी याचक की भूमिका में हैं. यह देश के तथाकथित विकास के खोखलेपन का द्योतक है. आज नए भारत के निर्माण की बात की जा रही है. अंतराष्ट्रीय स्तर पर नायक बनने का हम सपना संजो रहे हैं. कुछ अर्थशास्त्रियों ने तो भविष्यवाणी कर दी है कि आने वाले दिनों में भारत विश्व की आर्थिक शक्ति बन जायेगा. परंतु दलितों के उत्थान एवं भागीदारी के बिना क्या भारत पूर्ण रूप से विकसित हो पायेगा? जब तक हम अपने देश में ही सभी वर्गों का विकास नहीं कर पाते, तब तक ये बात बेमानी होगी.
कहने को तो दलितों को आरक्षण प्रदान किया जाता है, लेकिन क्या सिर्फ आरक्षण से दलितों का उत्थान हो जाएगा? जब तक हर स्तर पर दलितों की भागीदारी तय नहीं की जायेगी, भारत का समुचित विकास नहीं हो पायेगा. हमारा सर्वांगीण विकास हो इसके लिए जरुरी है की हर स्तर पर हमारी भागीदारी तय की जाए. एक लंबे अरसे से न्यायपालिका में आरक्षण की मांग हम लोगों द्वारा की जा रही है, परंतु कोई भी राजनैतिक दल हमारे इस मांग को तवज़्ज़ो नहीं दे रही है. दलितों में प्रतिभा की कमी नहीं है. गुण, बुद्धि, विवेक के मामले में हम किसी से भी कम नहीं हैं. अगर दलितों को न्यायपालिका के लिए अक्षम समझा जाता है, तो फिर न्यायपालिका सेवा आयोग का गठन कर के सभी को समान अवसर क्यों नहीं प्रदान किया जा रहा है?
आज के इस दौर में सरकारी नौकरियों में भारी गिरावट आयी है. नियुक्ति/भर्ती में भी कई वर्षों का बैकलॉग चलते रहता है. ऐसे में अधिकाँश लोगों को निज़ी क्षेत्र की नौकरियों पर ही आश्रित रहना पड़ता है. संविदा पर नियुक्ति तथा निज़ी क्षेत्र की नौकरियों में भी हमारे लिए आरक्षण जरुरी है. इस विषय पर भी संसद में कानून बनाकर दलितों को न्याय दिया जाना चाहिए. साथ ही पदोन्नति में आरक्षण का मामला भी ठन्डे बस्ते में पड़ा हुआ है. उन्नत शक्तियां पदोन्नति में आरक्षण ख़त्म करने में लगी हैं. इसके लिए हमें एकजूट होने की आवश्यकता है. यह हमारी एकजूटता में कमी का ही परिणाम है.
बाबा साहब के प्रयासों से प्राप्त संवैधानिक संरक्षण के तहत हमारी सामजिक स्थिति कुछ हद तक भले ही मजबुत हुई हो, परंतु आर्थिक स्तर पर हम अभी भी कमज़ोर हैं. इस कारण सामजिक स्तर पर भी हम पूर्ण रूप से मजबूत नहीं हो पा रहे हैं. यह सर्वविदित है की संपत्ति व्यक्ति विशेष को शक्ति प्रदान करता है. यदि कोई व्यक्ति अचानक संपन्न हो जाए तो उसे समाज में सम्मान स्वयं प्राप्त हो जाता है तथा समाज के कुरीतियों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है. अतः हमें आर्थिक रूप से भी मजबूत होना होगा. अन्यथा हमें विगत 5000 वर्षों की तरह हमेशा ही आर्थिक एवं सामजिक रूप से दबाया जाएगा.
हम दलितों को राज्य के स्तर पर भी बांटा जा रहा है. किसी जाती को एक राज्य में आरक्षण है, तो दुसरे में नहीं. इस मुद्दे पर भी हमें एकजूट होना होगा. हम दलितों का दर्द कोई दूसरा वर्ग नहीं समझ सकता.
अब हमें अपने लोगों को उनके दर्द के प्रति जगाना होगा. अपने हक़ के लिए अब स्वयं संघर्ष करने का समय आ गया है. आरक्षण की राजनीति की आड़ में हमारी भागीदारी को सीमित किया जा रहा है. बाबा साहब द्वारा दलितों के पक्ष में जितने भी सवाल उठाये गए थे, वे सब गौण होते जा रहे हैं. उनकी सोच के अनुरूप दलितों का विकास वर्तमान सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में नहीं हो पा रहा है.
हमारी किसी भी व्यक्ति, वर्ग या राजनैतिक दल से कटुता नहीं है, लेकिन उनके द्वारा तथाकथित दलितों के उत्थान के राजनैतिक प्रपंच से हमें बचना होगा. अब हमें एकजूट होकर अपने लिए स्वयं रणनीति बनानी होगी.

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