इन्दिरा गाँधी की शताब्दी जयन्ती वर्ष राष्ट्रीय कांगे्रस पार्टी और सरकार स्तर पर मनाये बिना ही बीत जाना बेहद विस्मयकारी- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

पटना, 28 नवम्बर, 2017
आज डा॰ जगन्नाथ मिश्र ने कहा है कि श्रीमती इन्दिरा गांधी की शताब्दी जयन्ती वर्ष मनाया जाना था किन्तु श्रीमती गाँधी की शताब्दी जयन्ती वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर मनाये बिना ही बीत जाना बेहद दुखद और विस्मयकारी है। देश उनके द्वारा किये गये जनहित के कार्यों और बलिदानों को भुला नहीं सकता। श्रीमती गांधी भारत की तीसरी और छठी प्रधानमंत्री थी और बहुत से लोग उन्हें प्यार करते थे, जबतक वे जीवित थीं उन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं किया गया। हर प्रधानमंत्री की सफलताएं और विफलताएं होती हैं। दोनों का आकलन समय-विशेष की पृष्ठभूमि में और उस संदर्भ में होता है जिनमें वे घटित हुई रहती हैं, और उन चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी, जिनका सामना उस समय देश को और प्रधानमंत्री को करना पड़ा था। जब श्रीमती गांधी 1966 में प्रधानमंत्री बनी- (1) दो युद्धों (1962 और 1965) ने देश के संसाधन चूस लिये थे। (2) तब अनाज की भारी कमी थी और देश पीएल 480 के तहत मिलने वाली खाद्य सहायता पर बुरी तरह निर्भर था। (3) कांगे्रस पार्टी का संगठन काफी कमजोर था (और बाद के दो साल के भीतर पार्टी आठ राज्यों में चुनाव हार गई) 1967 के निराशाजनक चुनाव नतीजों के बाद, कांगे्रस के सारे नेताओं में श्रीमती गांधी ही थीं जिन्होंने ठीक से यह पहचाना कि गरीब कांगे्रस से विमुख हो गये हैं। कांगे्रस को फिर से गरीबों का भरोसा जीतना होगा। श्रीमती गांधी ने एक ठोस एजेण्डा पेश करके आगे का रास्ता दिखाया, जो कि उस वक्त की प्रभावी विचारधारा से मेल खाता था-समाजवाद-कांगे्रस का।
डा॰ मिश्र ने कहा कि श्रीमती गांधी का 1970 से 1974 तक बतौर प्रधानमंत्री कार्यकाल भारत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। इस दौरान इन्दिरा जी ने पाकिस्तान को तोड़कर बंगलादेश बना डाला। पहला परमाणु परीक्षण पोखरण में करके भारत की वैज्ञानिक परमाणु शक्ति का पूरी दुनिया में लोहा मनवाया और सिक्किम का भारत में विलय करके भारतीय संघ की शक्ति के आधारभूत ढांचे को मजबूत करते हुए चीन और पाकिस्तान दोनों को ही चुनौती दी कि सांस्कृतिक एकात्मता की ऊर्जा में लोगों को आपस में जोड़ रखने की अपूर्व सामथ्र्य होती है। उन्होंने पंजाब में तब चल रहे आतंकवाद से डटकर लोहा लिया और उसी की वजह से उनका बलिदान भी हुआ। श्रीमती इन्दिरा गांधी जी जनता की नब्ज भलीभांति पहचानती थी। उनको अहसास था कि देश की कोटि-कोटि जन की भावनाओं का, जो समाज में एक लम्बे अर्से से उपेक्षित चला आ रहा था। उन्होंने अनुभव किया कि जनता के धैर्य का प्याला लबालब भर चुका था और वह अब कोरे वायदों पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थी।
उन्होंने कहा कि श्रीमती गांधी ने अनेक कार्यक्रमों से अपने देशवासियों के हृदय में एक विशिष्ट स्थान बना लिया। वे अद्भूत यशस्वी नेता हैं। प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने गरीबी के विरूद्ध संघर्ष को सद्भाव के रूप में न देखकर दायित्व के रूप में देखना प्रारंभ किया था। उन्होंने कहा था कि मूलभूत मानव अधिकार-जीने का समुचित स्तर, भोजन और अनिवार्य स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा या उचित कार्य के अवसर या भेदभाव से मुक्ति के अधिकार ही देश के सबसे गरीब लोगों की सबसे बड़ी जरूरत है। श्रीमती इन्दरा गांधी की दृष्टि के कारण विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भारत में शक्तिशाली स्वदेशीय आधार निर्मित किया गया। इसका सुन्दर इस्तेमाल श्रीमती गांधी ने किया था जिससे हमारा उत्पादन सभी क्षेत्रों में बढ़े तथा हमारी अर्थव्यवस्था और भी सामथ्र्यवान बन सके। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये देश महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनेक प्रौद्योगिकी मिशनों की स्थापना की गई। श्रीमती गांधी ने इस देश में वैज्ञानिक प्रकृति को विकसित करने की मनोदशा तैयार की। एक नये स्वतंत्र और अत्यन्त ही निर्धन देश के लिये इस दिशा में बढ़ाना आसान काम नहीं था, परन्तु इन्दिरा जी की दृष्टि थी कि यह एकमात्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी है जिससे भारत अपने को ऊपर उठा सकता था आज देश वर्तमान अवस्था में इसलिये है क्योंकि श्रीमती गांधी ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक बल दिया। विकास का अर्थ समाज के विकास से होना चाहिये, विकास में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका मुख्य होती है।

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