आरक्षण पर श्वेत पत्र की आवश्यकता- डा॰ जगन्नाथ मिश्र

डा॰ जगन्नाथ मिश्र ने कहा कि सरकारी सेवाओं में आरक्षण को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है, जिसे आने वाले दिनों में और बढ़ाने की कोशिश हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार के स्तर पर स्थिति को स्पष्ट कर दिया जाए कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को न सिर्फ कायम रखा जाएगा, बल्कि इसे और मजबूत किया जाएगा। राजग सामाजिक न्याय के चैंपियन के तौर पर सामने है। राजग बाकी दलों को दिखा दे कि वास्तविक सामाजिक न्याय कैसा होना चाहिये। आरक्षण की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक श्वेत पत्र केन्द्र सरकार लाये। उस श्वते पत्र में आरक्षण से जुड़े तमाम पहलुओं पर छानबीन करके रिपोर्ट रखी जाय। उस श्वेत पत्र पर राष्ट्रीय बहस हो औरउसके हिसाब से नीतियाँ बनें। आरक्षण रहने के बावजूद केन्द्र और राज्य सरकारों की सेवाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं हो पाया है? इस बारे में मिली जानकारी और तमाम अन्य स्रोत बताते हैं कि आरक्षण की वजह से जितने पद भरे जाने थे, उनमें से आधे या उससे भी कम पद अबतक भरे गये हैं। जाहिर है कि आरक्षण लागू करने में कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी हो रही है। जिन पदों को आरक्षण के द्वारा भरा जाना है, उन पदों को किसी और तरीके से कैसे भरा जा रहा है? इस बारे में जाँच हो। इस बारे में विचार करना चाहिये कि क्या आरक्षण को लेकर कानून बनाया जाना चाहिये और आरक्षण संबंधी प्रावधान के उल्लंघन को दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध घोषित करके इसके लिए आर्थिक दंड और कैद की सजा का प्रावधान होना चाहिये। संवैधानिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। केन्द्र सरकार के सचिव स्तर के पदों में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई अफसर नहीं है। यह लम्बे समय से चला आ रहा है। इसे देखते हुए यह आवश्यक है कि श्वेत पत्र इस बारे में विचार करे कि पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किस तरह सख्ती से अमल में आये, ताकि प्रशासन के शिखर पर भी सामाजिक विविधता नजर आये। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ ही अन्य पिछड़े वर्ग के लिए भी लागू हो, क्योंकि उच्च पदों पर इन तीनों समूहों की उपस्थिति न के बराबर है। श्वेत पत्र में इस बारे में सुझाव शामिल होने चाहिए। दलितों और पिछड़ी जाति के बच्चों के ड्राप आउट रेट का अध्ययन करें तो पता चलता है कि जैसे-जैसे इन समुदायों के बच्चों की कक्षा आगे बढ़ती जाती है उनकी शिक्षा क्रमशः कम होने लगती है। बिहार में ड्राप आउट रेट कक्षा 1 से 5 के बीच 77 प्रतिशत है जबकि देश का औसत 25 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति के छात्रों में यह दर 61 प्रतिशत है। बिहार में कक्षा 1 से 8 तक यह दर 76 प्रतिशत है। कक्षा 1 से 10 के बीच यह दर 85 प्रतिशत पहुँच जाती है। 1ली से 8वाँ तक पहुँचने के बीच बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। प्राइमरी में तो उनका कोटा पूरा हो जाता है, लेकिन आगे का कोटा भरता नहीं है। आरक्षण के बावजूद एक अध्ययन से पता चला कि राज्य के तमाम विभागों और श्रेणियों में 3,94,173 पदों में दलितों का प्रतिनिधित्व 6.19 प्रतिशत है। यानी आरक्षित पदों में आधे से कम पदों पर ही दलितों की बहाली हुई। हाउस होल्ड सर्वे में पता चला कि 23 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं।
डा॰ मिश्र ने कहा कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की उपस्थिति कैसे सुनिश्चित हो। खासकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और केन्द्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में कुलपति, निदेशक, संकाय प्रमुख, प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर सामाजिक विविधता का घोर अभाव है। सरकार इस बारे में आरटीआई में बार-बार जानकारी देती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि स्थिति को सुधारा कैसे जाए। इस बारे में ठोस सुझाव देने चाहिये, ताकि ज्ञान के सृजन के केन्द्रों में सामाजिक विविधता आये और शैक्षिक परिसरों का वातावरण समावेशी बने। इस बात का अध्ययन शामिल होना चाहिये कि आरक्षण के प्रावधानों के अंदर ऐसी कौन-सी व्यवस्थाएं की जाएं, ताकि इनका लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं को भी मिले। इन समूहों की महिलाएं एक साथ, जाति और लिंग-भेद, दोनों का दंश झेल रही हैं। इनको दोहरे सहारे और संरक्षण की जरूरत है। इन वर्गों की महिलाएं देश की आबादी का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा हैं, इसलिए इनकी तरक्की के बिना देश के विकास की कोई भी कल्पना साकार नहीं हो सकती। इन वर्गों की महिलाओं को महिला विकास के तमाम कार्यक्रमों में हिस्सेदार बनाने के लिए श्वेत पत्र उपाय सुझाये।
डा॰ मिश्र ने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि उसका इरादा आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत करना है। यह बात जनता तक स्पष्ट पहुँचनी चाहिये कि समीक्षा करने का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है। इस बारे में सरकार और सरकार में शामिल दलों और अनुषंगी संगठनों को अनावश्यक बयानबाजी से सख्त परहेज करना चाहिये। बिहार चुनाव के नतीजों से जाहिर है कि यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से कितना संवेदनशील बन गया था और इसके कितने गहरे नतीजे हुए हैं। यह समझना आवश्यक है कि आरक्षण और विशेष अवसर का सिद्धांत हमारे संविधान और लोकतंत्र के मूल में है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने इसका प्रावधान मूल अधिकारों के अध्याय में ही किया है और स्पष्ट किया है कि इससे समानता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। भारत जैसा विविधतापूर्ण देश, राजकाज की संस्थाओं और अवसरों में सामाजिक विविधता सुनिश्चित किये बगैर एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकता। सामाजिक विविधता इस देश की ताकत है। इसका प्रतिविम्ब तमाम संस्थाओं में नजर आये इसके लिए आरक्षण के प्रावधानों को मजबूत किया जाय। सरकार और राजनीतिक पार्टियों को महज वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर समाज के वंचित वर्ग के लिए ठोस कार्यनीति अपनाने की जरूरत है। देश में 94 फीसद बच्चे 12वीं के बाद शिक्षा जारी नहीं रख पाते और इनमें अधिकतर कोटा वर्ग के होते हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को अभिशप्त करीब 40 करोड़ आबादी में तकरीबन 32 करोड़ कोटा वर्ग के लोग हैं। इनकी गरीबी दूर हो इस पर गंभीर विमर्श और पहल की जरूरत है। आरक्षण के हिमायती अक्सर इन मुद्दों से कतराते नजर आते हैं।

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