विश्व महिला दिवस पर साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुआ कवयित्री सम्मेलन

पटना, ८ मार्च। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का मंच आज पूरी तरह महिला साहित्यकारों को समर्पित रहा। बड़े दिनों के बाद आज सम्मेलन बिलकुल अलग तेवर और मिज़ाज में दिखा। कवयित्रियाँ भी ख़ूब मौज में रहीं और एक से बढ़कर एक गीतग़ज़ल सुनाकर, सम्मेलनसभागार को ख़ुशनुमा माहौल से भर दिया। कवयित्रियाँ मंच पर प्रतिष्ठित थीं और कविगण श्रोता दीर्घा में बैठ कर इस यादगार क्षण को नज़रों में समा कर रख लेना चाहते थे। खचाखच भरे सभागार में प्रमुख साहित्यिक हस्तियों को, सुधी जनों के साथ कवयित्रियों को, भावविहवल मुद्रा में सुनाते देखना भी एक सुखद अनुभूति की तरह थी। अवसर था, विश्व महिला दिवस पर साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित कवयित्री सम्मेलन का। वरिष्ठ कवयित्री डा सुभद्रा वीरेंद्र की अध्यक्षता में आयोजित कवयित्रीसम्मेलन का उद्घाटन जागो बहन की संस्थापिका और कवयित्री डा शांति ओझा ने किया।

कविताओं की सरिता की गंगोत्री बनी कवयित्री प्रो लक्ष्मी सिंह ने वाणीवंदना और सामयिक लोक गीत से गीत का जल छोड़ा। कवयित्री आराधना प्रसाद ने, स्त्रीमन की सुरभि और सौंदर्य का परिचय इन पंक्तियों में दिया कि, “फूल, ख़ुशबू, कभी जन्नत की परी होती है/ बेटी माँबाप के सपनों की लड़ी होती है।। सागरिका राय ने नारीशक्ति को इन पंक्तियों से रेखांकित किया कि, “ कितनी बार कहा जगने कि, तू तो अबला नारी है/ दोदो मात्राएँ लेकर नर से नारी भारी है

कवयित्री पुष्पा जमुआर ने कहा– “नही बनेगी नारी अब द्रौपदी, सीता, गांधारी और अहिल्या/ वह शाप मुक्त है/ स्वावलंबी है/ गृहिणी के साथसाथ वह है,सैनिक, सिपाही और पायलट। डा सीमा यादव ने कहा कि, “किताबें करती हैं, इंतज़ार, बेटी का/ जो छोड़ गई है उन्हें बिस्तर पर यूँ ही। डा सुमेधा पाठक ने स्त्रीमन की विशालता का परिचय दिया कि, “मैं सागर हूँ निर्बाध, निस्पृह/ मैं आकाश के वितान तले, धरती के सीने पर धड़कती हूँ

शायरा निकहत आरा ने स्त्रीत्वको इन शब्दों में समाहित किया कि, “कच्ची मिट्टी को जब खुदा ने नम्र एहसास से गूँथा तो एक नाज़ुक सी काया स्त्री की ख़ूबसूरत पैकर में ढल कर तैय्यार हो गई। डा सुलक्ष्मी कुमारी ने कहा – “मत पूछ कि कौन हूँ मै? नारी हूँ मैं/ नारी हूँ मैं/ मैं प्रेम हूँ/ मै राग हूँ/ मैं वसंत हूँ/ मैं फाग हूँ/ मै गीत हूँ/ मल्हार हूँ

वरिष्ठ कवयित्री डा शांति जैन का कहना था कि, ” मेरे ख़त का जवाब आया/ माँ के ख़त के शब्दशब्द से मैं पल में अनमोल हो गई। आँखों की किरकिरी गर्ल थी/ अब अमृत की घोल हो गई। डा मीना कुमारी ने इन शब्दों से महिलाओं का आह्वान किया कि, “उड़ान भरो औरत/ रूढ़ियों के पिंजरे से निकल कर उड़ान भरो

लेखिका और कवयित्री डा ममता मेहरोत्रा, डा अर्चना त्रिपाठी, पूनम आनंद, कुमारी लता प्रासर, स्वयंप्रभा, अनुपमा गुप्ता, नंदिनी प्रियम, डा सीमा रानी, विजया श्री, मोनल जैन, डा अंजुला, डा बबिता कुमारी, कुमारी अंजलि, पूजा ऋतुराज, कुमारी मेनका ने भी अपनी रचनाओं से ख़ूबसूरत अहसास जगाया।

अपनी अध्यक्षीय कवितापाठ में, डा सुभद्रा वीरेंद्र ने अपने कोमलस्वर से नवीनता का आह्वान किया – “नयी कल्पना क्यों न करे हम/ नयी अल्पना क्यों न भरे हम

सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ, उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, डा शंकर प्रसाद, डा कुमार वीरेंद्र, कवि आरपी घायल, डा वासुकी नाथ झा, डा मेहता नगेंद्र सिंह, देवेंद्र देव, विश्वनाथ वर्मा, योगेन्द्र प्रसाद मिश्र, डा नागेश्वर प्रसाद यादव, अश्विनी कुमार, नरेंद्र देव समेत बड़ी संख्या में साहित्यसेवी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे। मंच का संचालन कवयित्री शालिनी पांडेय ने किया। 

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