साहित्य सम्मेलन में राजभाषा हिन्दी सप्ताह तथा ‘पुस्तक चौदस मेला’ का हुआ उद्घाटन

एक राष्ट्र की ‘राष्ट्र-भाषा’भी एक ही होनी चाहिए और उसे हीं मिले राजभाषा का दर्जा

वक्ताओं ने कहा प्रत्येक १४ सितम्बर को ‘पुस्तक-चौदस’के रूप में मनाएँ भारतवासी

पटना,१४ सितम्बर । एक राष्ट्र की ‘राष्ट्र-भाषा’भी एक ही होनी चाहिए और उसे हीं मिलना चाहिए ‘राजभाषा’का स्थान। विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली भाषाओं को वहाँ की प्रांतीय सरकार की ‘राज्य-भाषा’बनाई जानी चाहिए। चौदह सितम्बर को भारत भर में’पुस्तक-चौदस’के रूप में मनाया जाए। उसी भाव के साथ, जिस भाव से भारत में ‘धन-त्रयोदशी’मनाया जाता है। जिस तरह ‘धन-त्रयोदशी’के दिन भारत के लोग कुछ न कुछ ‘धन’ का क्रय करते हैं, इस भाव के साथ कि इससे घर में’श्री’ की वृद्धि होगी, उसी तरह पुस्तक चौदस के दिन नई पुस्तकें क्रय कर घर लाएँ,इस भाव के साथ कि,इससे घर में प्रज्ञा और संस्कार की वृद्धि होगी।

इस तरह के विचार शनिवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में’हिन्दी-दिवस’के अवसर पर ‘राजभाषा हिन्दी सप्ताह तथा पुस्तक चौदस मेला’ के उद्घाटन समारोह में विद्वानों ने व्यक्त किए। समारोह का उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि, हिन्दी स्वतंत्रता-आंदोलन की भाषा रही है। भारत की स्वतंत्रता में हिन्दी की बड़ी भूमिका सिद्ध हुई। इसमें संपूर्ण भारत को जोड़ने और एक सूत्र में बाँधने की शक्ति है। इसे विज्ञान और तकनोलौजी की भाषा बनाई जानी चाहिए। ज्ञान और विज्ञान की भाषा बनते हीं इसकी चतुर्दिक उन्नति हो जाएगी। देश में हर जगह इसे संपर्क-भाषा के रूप में मान्यता है। इसे न्यायालय की भाषा भी होनी चाहिए। व्यवहार न्यायालयों में अब प्रचुरता से हिन्दी में निर्णय दिए जा रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है।

समारोह के मुख्यअतिथि और मगध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’ ने कहा कि, हिन्दी भारत की अस्मिता और पहचान है। सिख धर्म के प्रवर्त्तक गुरूगोविंद सिंह महाराज की अधिकांश रचनाएँ हिन्दी में है। वे भी यह मानते थे कि, हिन्दी भाषा की उन्नति से राष्ट्र मज़बूत होगा।

सभा की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, यह सही अवसर है जब संपूर्ण भारत एक स्वर में कहे कि एक राष्ट्र की ‘राष्ट्र-भाषा’भी एक ही होनी चाहिए और वह ‘हिन्दी’होगी। भारत की अन्य भाषाएँ, अपने अपने प्रांतों की ‘राज्य-भाषाएँ’बनाई जाए और सभी भारतीय भाषाओं को उचित सम्मान प्राप्त हो। १४ सितम्बर १९४९ को भारत की संविधान सभा ने ‘हिन्दी’को भारत की ‘राज भाषा’ बनाने का निर्णय लिया था, जिसके उपलक्ष्य में हम प्रत्येक १४ सितम्बर को ‘हिन्दी-दिवस’का उत्सव मनाते हैं। किंतु भारतीय संविधान की भावना का सम्मान हम आज तक नहीं कर पाए। अभी भी हिन्दी भारत की सरकार के कामकाज की भाषा नहीं बन पाई है। अभी भी एक विदेशी भाषा देश की ‘राजभाषा’बनी हुई है, जो प्रत्येक भारत वासी के लिए’वैश्विक-लोक-लज्जा’का विषय है।

भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और कवि प्रकाशनाथ मिश्र,सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, डा मधु वर्मा, डा शंकर प्रसाद, डा शांति जैन, डा भूपेन्द्र कलसी, डा शांति ओझा,कालिन्दी त्रिवेदी,डा शालिनी पाण्डेय,अमीयनाथ चटर्जी,राज कुमार प्रेमी,सुभद्रा शुभम, चंदा मिश्र, शुभचंद्र सिन्हा, प्रो सुशील कुमार झा, डा रणजीत कुमार, आनंद किशोर मिश्र, अजय कुमार सिंह, शकुंतला मिश्र,डा सविता मिश्र ‘मागधी’,राज किशोर झा, डा उमेश चंद्र शुक्ल, ज्ञानेश्वर शर्मा, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, श्याम बिहारी प्रभाकर, नरेंद्र झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के प्रधानमंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन डा नागेश्वर प्रसाद यादव ने किया। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने किया।

पुस्तक-मेले में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी, सम्मेलन का प्रकाशन विभाग, वातायान,अनामिका प्रकाशन,प्रज्ञा प्रकाशन आदि प्रकाशक भाग ले रहे हैं। मेले में साहित्य के अतिरिक्त,विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान,प्रबंधन, अभियंत्रण समेत पाठ्य-पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। अनेक दुर्लभ ग्रंथों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है। विद्यार्थियों का ध्यान खींचने के लिए, प्रत्येक दिन विविध प्रकार की इनामी प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जा रही हैं। एक अलग दीर्घा में स्थानीय लेखकों की पुस्तकें भी विक्रय हेतु रखी गई हैं। सभी पुस्तकों पर २५ प्रतिशत की छूट दी जा रही है।

Author: Anupam Uphar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

+ 31 = 38